Tuesday, 10 April 2018

सामाजिक क्रांति के महानायक महात्मा ज्योतिबा फुले

आज 11 अप्रैल के दिन सामाजिक क्रांति के महानायक महात्मा ज्योतिबा फुले Mahatma Phule जयंती के अवसर पर उनका जीवन परिचय मेरा स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण संक्षिप्त लिखने को मजबूर हुआ हूँ सभी साथियों से आशा करता हूँ सभी को अच्छा लगे इसमें आपके जो भी सुझाव हो comment Box में जरूर बतायें
Mahatma Phule
Mahatma Phule

प्रारंभिक जीवन :-

महात्मा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा पुणे महाराष्ट्र में हुआ था उनके पिता का नाम गोविंदराव फुले Govind rao  था 1 वर्ष की आयु में उनकी माता का निधन हो गया ज्योतिबा का पालन पोषण उनकी दाई सुगना बाई ने किया महात्मा फुले माली समाज के थे ।
7 वर्ष की उम्र में स्कूल की सीढ़ी चढ़ी लेकिन उस समय जातिवाद तथा शूद्र वर्ग के होने के कारण ब्राह्मणवादियों ने स्कूल से निकलवा दिया लेकिन गफ्फार वेग मुंशी Gaffar veg munshi था लिजित साहब की सहायता से उन्हें पुनः स्कूल जाने का मौका मिला ।
सन 1840 में महात्मा फुले की शादी सावित्रीबाई फुले के साथ हुई तथा महात्मा फुले के साथ सामाजिक आंदोलन में संघर्ष किया .

जातिवाद के कारण हुए अपमानित :-

एक बार ज्योतिबा फुले को उनके ब्राह्मण मित्र के निमंत्रण पर उनकी शादी में गए लेकिन एक शुद्र Shudra  को ब्राह्मण की बारात में शामिल होना ब्राह्मणों को अच्छा नहीं लगा तो महात्मा फुले जी को उस बरात में से अपमानित Humiliated करके बाहर निकाल दिया ,ज्योतिबा फुले को बारात में अपमानित होना उन्हें बहुत खराब लगा इस घटना ने उन्हें हिला का रख दिया और सोचने पर मजबूर हो गए , जब मुझ जैसे पढ़े लिखे सछूत शुद्र माली समाज की यह हालत है तो जिस देश में अछूत वर्ग ,महिलाएं है उनकी क्या हालत होगी तब उन्होंने इस जातिवादी प्रथा Racism को समाप्त करने का संकल्प लिया और उन्होंने इसका कारण अशिक्षा अज्ञानता बताया ।

शिक्षा  (Education) के दरवाजे खोले :-

महात्मा फुले जी ने सन 1848 को सबसे पहली इस देश में लड़कियों और अछूतों के लिए पाठशाला School खोली तथा स्कूल में पढ़ाने के लिए उनकी पत्नी माता सावित्रीबाई फुले को पढ़ाने के लिए तैयार किया माता सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की सबसे पहली शिक्षिका Teacher बनी .
इससे पहले 5000 सालों में किसी ने स्कूल नहीं खोली न ही पढ़ने लिखने का मौका मिला क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार पढ़ने पढ़ाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को था .


घर से बाहर निकाला :-

महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले का अछूतों , शूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा Education देना पढ़ाना लिखाना ब्राह्मणों को पसंद नहीं आया उसने महात्मा फुले के पिता गोविंदराव को ब्राह्मणों ने भड़का दिया जिस कारण उनके पिता ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया तथा स्कूल उस जगह पर बंद करना पड़ा .
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और उनके मित्र उस्तान शेख नाम के मुसलमान ने अपने घर पे स्कूल चलाने के लिए जगह दी ।


सामाजिक सुधार Social Reform :-

महात्मा फुले ने शिक्षा सुधार के साथ-साथ सामाजिक सुधार में भी महत्वपूर्ण Important योगदान दिया ,किसानों की समस्या मुद्दों की बात को जोर-शोर से उठाया, उन्होंने  उस समय किसानों की समस्या के जो मुद्दे उठाए वो आज और भी ज्यादा तीव्र हो गए हैं जबकि वह ब्रिटिश British भारत था आज आधुनिक भारत है .
वे  प्रश्न करते हैं
“शारीरिक एक रचना में किसी भी तरह का अंतर न होने पर भी   दिन भर पसीना बहाने वाला सृष्टि का पालनहार किसान दुखी और भ्रष्ट नौकरशाह सुखी ऐसा क्यों “
उन्होंने सन 1864 में पहला विधवा विवाह कराया तथा बालहत्या प्रतिबंध, विधवा का मंडन प्रथा का महात्मा फुले तथा सावित्रीबाई फुले ने इसका विरोध किया, उन्होंने अपने घर का कुआं अछूतों के लिए खोल दिया तथा 1873 में पुरोहितों के बिना विवाह विधि आरंभ कर दी , तथा इसी दौरान 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की , तथा प्रचारित करने के लिए किताबें लिखना आरंभ कर दी
सन 1876 से 1882  समय में पुणे नगर पालिका के सदस्य वे चुने गये तथा इस शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 12 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा करने का प्रस्ताव रखा और उनका यह प्रयास था कि यह अनिवार्य हो ।
महात्मा फुले ने उस समय में 1873 में गुलामगिरी नामक प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी ।


महात्मा की उपाधि :-

महात्मा फुले जी ने अछूतों शूद्रों और महिलाओं
तथा निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए जीवन भर त्याग बलिदान तथा संघर्ष किया उनकी इस समाज सेवा को देखकर सन 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें महात्मा की उपाधि Degree दी गई ।

निधन :-

महात्मा फुले जी का निधन 28 नवंबर 1890 को उनका निधन हो गया वे एक ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने इस कारवां की शुरुआत की , संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने महात्मा फुले को अपना  गुरु Teacher मानते थे ।
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Saturday, 7 April 2018

भारत में वैज्ञानिक तथा अवैज्ञानिक सोच........

 भारत में वैज्ञानिक तथा अवैज्ञानिक सोच

वैज्ञानिक अवैज्ञानिक सोच
भारत में वैज्ञानिक तथा अवैज्ञानिक सोच
  9मार्च के दिन दैनिक भास्कर समाचार पत्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर जी का लिखा एक लेख पड़ा । लेख का शीर्षक  था “विज्ञान विरोधी रवैया भारत को महाशक्ति नहीं बना सकता” लेख में उदाहरणों के साथ बताया गया है, कि प्रधानमंत्री सहित भाजपा के नेता और भाजपा से सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति अपने भाषणों में विज्ञान के सिद्धांतों पर हमला करते हैं ,और अवैज्ञानिकता का प्रचार करते हैं। लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अक्टूबर 2014 में मुंबई के अस्पताल के उद्घाटन समारोह में दिए गए भाषण का उल्लेख है,जिसमें दावा किया था कि हाथी के सिर वाले देवता गणेश इस बात का सबूत है कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का ज्ञान था।लेख में राजस्थान के शिक्षा मंत्री Education minister व भाजपा के दिग्गज नेता वासुदेव देवनानी के दावे का उल्लेख भी है जिसमें उन्होंने कहा था  गाय ही केवल एक मात्र ऐसा प्राणी है जो ऑक्सीजन लेती है, और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। लेख में राजस्थान के हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस महेश चंद शर्मा के इंटरव्यू के बारे में भी लिखा है ,जिसमें उन्होंने कहा था, कि भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर Peacock जीवन भर ब्रह्मचारी रहता है और अपने आंसुओं को मोरनी पी लेती और मोरनी को गर्भवती बनाता है।
लेख को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए भाजपा नेता और भाजपा से सहानुभूति रखने वाले जानबूझकर विज्ञान की भूमिका को कमजोर करना चाहते हैं ।लेकिन मेरा मानना यह है कि ऐसे नेता और व्यक्ति जानबूझकर विज्ञान के सिद्धांतों पर हमला नहीं करते जानबूझकर अवैज्ञानिकता Unscientific का प्रचार नहीं करते । बल्कि जिन अवैज्ञानिक सिद्धांत Principle का वे प्रचार करते हैं उन सिद्धांत और बातों को वे सही और सत्य समझते है। वैज्ञानिक सिद्धान्त मानते है ।
हमारे देश में बच्चे दो तरह से शिक्षा पाते हैं पहला तरीका वह है जिससे बच्चे स्कूल के बाहर सीखते हैं ,दूसरे तरीके के अनुसार बच्चे स्कूल Schools में पढ़ते और सीखते हैं। स्कूल जाने से पहले  बच्चों को पता चल जाता है कि दिन रात क्यों होते है। बच्चे जब सुबह नहाते हैं तो अक्सर दादा-दादी कहते हैं कि बेटा स्नान कर लिया अब सूर्य भगवान   Sun God को नमस्कार कर लो। जिज्ञासा-वश जब बच्चे सूर्य भगवान के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि सूर्य भगवान है और वे संसार को रोशन करने के लिए रथ पर बैठकर आते है। सूर्य भगवान के रथ को 7 घोड़े  खींचते है।
बच्चे जब बरसात के मौसम में इंद्रधनुष के बारे में पूछते हैं। तो उन्हें बताया जाता है कि स्वर्ग में इंद्र भगवान रहते हैं ।जो वर्षा के देवता हैं उन्हीं की कृपा से धरती Land पर पानी बरसता है ,जो तुम आकाश में इंद्रधनुष देख रहे हो यह धनुष उन्हीं भगवान का है ।
चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के समय जब बच्चे घर के बुजुर्गों  से चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के बारे में जानना चाहते हैं,तो उन्हें बताया जाता है कि राहु नाम का राक्षस सूर्य भगवान और चंद्रमा Moon को निगल जाता है तब ग्रहण लगता है ग्रहण के समय उपवास रखो ,खूब दान-पुण्य करो। तभी इस राक्षस  के चंगुल से सूर्य और चंद्र देवता को जल्दी से जल्दी मुक्ति मिल पाएगी। बच्चों के दिमाग में अनजाने में ऐसे हजारों अवैज्ञानिक सिद्धांत  Principles बैठा दिए जाते हैं।
जब बच्चे स्कूल में पढ़ने जाते हैं तो उन्हें विज्ञान की शिक्षा  Education दी जाती है लेकिन प्रथम गुरु द्वारा ही बच्चों के दिमाग में इतना झूठ बैठा दिया जाता है ,कि उन्हें विज्ञान Science की सच्चाई समझ में नहीं आती । परीक्षा में पास होने के लिए बच्चे किताबों में लिखी बातों को रट लेते हैं। और परीक्षा Exam में अच्छे नंबरों से पास भी हो जाते हैं लेकिन दिमाग Mind में बैठे झूठ के कारण स्कूली किताबों में लिखी बातों पर विश्वास नहीं कर पाते ।

मैं ऐसे कई पढ़े लिखे और शिक्षित व्यक्तियों से मिला हूँ जो पड़े लिखे होने के बाद भी अवैज्ञानिक सोच Thinking के और अंधविश्वासी हैं। मैं एक वकील से मिला जो कह रहे थे ,कि हमारी बच्ची  के जन्म Birth से ही बड़े-बड़े और घुंघराले बाल  थे। मैं घुंघराले और सुन्दर बालों का मुंडन नहीं करवाना चाहता था, लेकिन करवाना पड़ा क्योंकि जब तक मुंडन नहीं होता है तब तक जन्म के समय के अपवित्र बालों के साथ मंदिर Temple नहीं जा सकते थे। मैंने वकील साहब से प्रश्न किया कि इतने पढ़े लिखे होने के बाद भी अपवित्रता Unholines और छूतक को मानते हैं तो वह कहने लगे रामायण महाभारत वेद पुराणों में लिखी बातें गलत नहीं  होती हैं।

मैं भाजपा विरोधी ऐसे लोगों से भी मिला हूँ जो पढ़े लिखे हैं अच्छे पदों पर भी है लेकिन अवैज्ञानिक  सोच Thinking के और अंधविश्वासी है ।
राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने मोर Peacock  बारे में जो भी कुछ कहा है। वह बात मैंने हजारों लोगों के मुख से सुनी है । जाहिर है ,उन हजारों लोगों में से सभी लोग देश को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाना होंगे। मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भवती Pregnant होती है यह बात भले ही असत्य और अवैज्ञानिक Unscientific है । लेकिन इस देश के लाखों लोग इस बात को सही और सच्ची मानते हैं , और तब तक सही मानते रहेंगे ,जब तक उन्हें इस बात का ठोस प्रमाण नहीं मिल जाता ,कि अन्य जीव जंतुओं Animals की तरह मोर ,मोरनी के मिलन से मोरनी गर्भवती Pregnant होती है ।
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Friday, 30 March 2018

क्या दलित हिन्दु शुद्र हैं ?

Dalit Hindu Shudra
उजाले की ओर Part 1

क्या दलित हिन्दु शुद्र हैं ?

दलित शब्द को शूद्र शब्द का पर्यायवाची शब्द समझा जाने लगा है .संजीव जायसवाल की फिल्म Shudra the Rising में दलित वर्ग (अनुसूचित जाति )  Schedule caste को शुद्र के रूप में दिखाया गया है, जबकि ब्राह्मण साहित्य (वैदिक साहित्य) में दलित वर्ग को शूद्र वर्ग में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि दलित वर्ग चारों वर्णों और ब्राह्मण धर्म से बाहर बाबा साहिब की   लिखी पुस्तक शूद्रों की खोज (Who was shudra )के पेज नं. 20 में लिखा, कि“ सवर्ण का अर्थ है ,कि चारों वर्णों में से किसी एक का होना” अवर्ण का अर्थ है ,कि चारों वर्ण से अलग होना, ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य तथा शूद्र सवर्ण है और अछूत (Untouchables) अतिशुद्र अवर्ण है ।
वरिष्ठ धर्मसूत्र में कहा गया है ,कि कृपण ,श्रोत,होत्र,बीमार,कैदी,सोम बेचने वाला बढ़ई, धोबी ,शराब बेचने वाले, जासूस ,प्याज खाने वाले तथा मोची का दिया हुआ भोजन न शूद्र का दिया हुआ भोजन भी न खावें।


वरिष्ठ धर्मसूत्र में बढ़ई, धोबी और मोची को अलग दर्जा दिया गया और शूद्र को अलग दर्जा गया है इसका मतलब है ,कि मोची,बढ़ई ,धोबी और SC ST  की गणना शूद्र वर्ग में नहीं की जाती थी . बल्कि दलित वर्ग को अवर्ण का दर्जा प्राप्त था ,शास्त्र में अंत्यज कहा गया है, जिसका अर्थ होता हैं अंत में मतलब चारों वर्णों के अंत में ब्राह्मण धर्म (वैदिक धर्म) से बाहर महात्मा  फुले के द्वारा लिखी गई पुस्तक गुलामगिरी Gulamgiri के पेज नंबर 67 पर महार जाति को महाअरी क्षत्रिय लिखा है। मतलब महाराष्ट्र की महार जाति अछूत बनने से पहले क्षत्रिय वर्ण में आती होगी बाद में महारों को बहिष्कृत कर दिया तथा  अवर्ण (अंत्यज ) बना दिया होगा .


वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था:-


प्रारंभिक काल में भारतीय समाज में किसी भी तरह की  वर्ण व्यवस्था नहीं थी, बाद में भारतीय समाज को अप्राकृतिक तौर से 4 भागों या 4 वर्ण में  विभाजित किया गया है. और ब्राह्मणों ने अपनी उच्चता और श्रेष्ठता को स्थाई कर लिया ,यह चार वर्ण थे ( ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र) अप्राकृतिक तौर से 4 वर्ण बन जाने के बाद  उस काल तक व्यक्तियों में किसी तरह की छुआछूत की प्रथा नहीं थी, न ही उस समय पर कोई बहिष्कृत या अंत्यज वर्ग था , लेकिन जैसा कि हम सभी जानते है ,कि ब्राह्मण धर्म में कई प्रकार के अंधविश्वासों (Superstiitious) और अंधश्रद्धा से भरा पड़ा है, यहाँ  जन्म, मृत्यु और रजोधर्म का अपवित्रता (Impiety) (छूतक)  के रूप में मानते . जब किसी के  कुटुंब में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी, तो उस परिवार में अपवित्रता आ जाती थी, और उस कुटुम्ब को इतने दिनों तक अछूतों की तरह रहना पड़ता था, जब तक तक वे  परिवार (Family) में अपवित्रता (Unholines) को दूर करने के लिए साफ सफाई नहीं कर लेते थे, तथा गंगा जैसी पवित्र मानने वाली नदियों में स्नान नहीं कर लेते थे एवं पंडित पुजारियों से धार्मिक कर्मकांड नहीं करवा लेते थे, इसी तरह प्रसव माता को अपवित्र समझते. परिवार (Family) के लोग Person उनका छुआ हुआ पानी तक नहीं पीते थे. जब तक उस महिला से पवित्र होने के लिए टोने-टोटके नहीं करवा लिये जाते थे ,इस घोर अंधविश्वास के कारण नवजात शिशु को भी अपनी मां का 6 दिनों तक दूध नहीं पिलाया जाता था. इसी तरह महिला जब माहवारी से होती थी ,तो उसे रसोईघर (kitchin) में जाने की अनुमति नहीं होती थी ।


कबीलों और रजवाड़ा में धन, जमीन चारागाहों के लिए आपसी संघर्ष होते थे, जिन कबीलों के लोग एक दूसरे से संघर्ष में हार  जाते , वे अपने घर बार छोड़कर बाहर चले जाते थे, और अपने दूसरे राज्यों में छिपकर रहने लगते थे,,पराजित और छितरे (Scattered) हुए लोगों को दूसरे राज्य में जिंदा रहने के लिए वे मजबूरी में अपवित्र काम और व्यवसाय करने पड़ते थे, जो वहां स्थाई रूप से बसे व्यक्ति काम करने में शर्म महसूस करते थे, छितरे  हुए लोगों को राज्य दंड प्राप्त व्यक्तियों को मृत्यु दंड देना पड़ता था ,तथा उन्हें उस मृत व्यक्ति के वस्त्र (Cloths) आभूषण लेने का अधिकार था, ऐसे व्यक्तियों को लोग चंडाल कहते थे । चांडालों को सबसे पहले वर्ण व्यवस्था से बहिष्कृत अवर्ण ( अंत्यज) अछूत (Untouchables) बना दिया था. जिन लोगों ने जन्म के समय गर्भवती माता के कपड़े धोये उन्हें भी अछूत अंत्यज घोषित कर दिया, जिन्होंने जन्म देने वाली माता का प्रसव के समय मदद की उनको भी अछूत अंत्यज (Untouchables)  बना दिया  गया .जिन-जिन लोगों को भी अपवित्रता से जुड़े काम करने पड़े उन्हें समय-समय पर हमेशा के लिए अछूत घोषित कर दिया गया ,जो व्यक्ति जन्म मृत्यु से जुड़ी, अपवित्रता दूर नहीं कर पाये उन्हें भी अछूत  अपवित्र (Unholines) घोषित कर  दिया गया।

लेखक :- भोलाराम




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Tuesday, 27 March 2018

Read what is Poona Pact 1932 in English

Poona act 1932
Poona  Pact 
Baba Saheb had put the problems of untouchables in front of the British government ... and demanded special privileges for them ....
Considering the rational arguments of Baba Saheb, the British Government accepted the request of Baba Saheb Dr. Ambedkar to give special facilities ... and in 1927 Simon Commission came to India,
Mr. Gandhi did not like to come to the Simon Commission of India,
So, he made a tremendous slogan, "Simon Commission Go Back"




Baba Saheb made it clear to the British government that the untouchables have a different existence than the Hindus, they are living like slaves, they have neither the authority to fill water from public wells nor have the right to write,
In the Hindu religion, the rights of untouchables have been abducted ... and they have no existence of their own, therefore they continue to declare them as part of Hindu religion ....
In the Round Table Conference of London in 1930, 1931, 1932, Baba Saheb Dr. Ambedkar advocated a society called untouchable .... He also did not spare the British government and said ... what is the British Empire Shahi took any step to finish touching .....
There was no shortage of oppression on the untouchables in the British State for 150 years.
Baba Saheb's argument in the Round Table Conference was so concrete and authoritative that the British government had to bow before Baba Saheb ....
In 1932, Ramsay MacDonald announced a plan for minority representation .... It was known as the Communal Award ....
In this award, the society called "untouchables" got "double right"

➡️First, they will choose differently in reserved reserved seats.

➡️and the second two votes got the right,

For one vote reserved seat and for the second seat reserved for unreserved seat ....
By giving this right, Baba Saheb Dr. Ambedkar's height became very high in the society, Dr. Ambedkar said in relation to this right ....
With the demand for the right to electoral election, we are not going to harm any Hindu religion ... ... we only want freedom from the dependence of building our destiny on those upper castes ....
Ammdar was in opposition to the Communal Award ... They did not want that the untouchables are different from the Hindus ....
They considered the untouchables as an integral part of the Hindus But when Baba Saheb Dr. Ambedkar questioned Gandhi ....

Q. If the untouchables are an integral part of the Hindus then why do they treat them like animals?


But never answer Mr. Gandhi, Baba Saheb.

Baba Saheb told Mr. Gandhi Mr. Mohan Das Karam Chand Gandhi You can be a very good nurse of untouchables ... but I am his mother ... and mother is my mother Never allow harm to happen ....
Mr. Gandhi hunger strike against the Communal Award ....
At that time he was in Yerawada Jail and this was the right that millions of untouchables of the country would get a new life and they would be free from the enslavement of centuries ... But due to the fasting of Mr Gandhi, Baba Saheb On the expectations of the water revolving,
Mr. Gandhi was stubborn on his stance, Baba Saheb did not want to lose this right at any cost ....
Due to the hunger strike, Gandhi ji reached near death, in between, Baba Saheb got many letters filled with threats ... ... in which he wrote that he should leave this right or else he would not be okay . such a letter to Baba Saheb could not be distracted a bit .... He was not afraid of his dying ....
The condition of Mr. Gandhi was worsening day by day Meanwhile, Baba Saheb got more letters that if anything happens to Gandhiji, we will destroy the untouchables' settlements. ...
Baba Saheb thought, when the untouchables are not there, then for whom I will fight, Baba Saheb's friend also explained to Baba Saheb that ....
If a Gandhi dies, the second Gandhi will be born, but you will not be there, then what will happen to your society Baba Saheb, after seriously considering his mind, Made it ....
And on September 24, 1932, Baba Saheb, who was tears in eyes, signed Poona Pact. In this context Baba Saheb's name will remain immortal because he gave life to Mr. Gandhi ...
On the third day, Dr. Ambedkar organized a Dhikkar Diwas of Poona Pact ... .. Dr. Ambedkar, who was crying from the stage said, "By signing the Poona Pact, I have made the biggest mistake of my life I was constrained to do this my children Improve my mistake ...
Baba Saheb has never considered Mr. Gandhi as a saint in his life, he considers Jyotiba Phule as the true Mahatma.

Monday, 19 March 2018

कांशीराम जी का अन्तिम उद्देश्य

Kanshiram sahab
कांशीराम जी का अन्तिम उद्देश्य 
साल1965 के समय जब कांशीराम जी बाबा साहब डॉ अंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर बाबा साहब के आंदोलन मूवमेंट को बढ़ाना चाह रहे थे ,तब उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) में साहब कांशीराम जी शामिल हुए लेकिन RPI के नेतागण बाबा साहब के Movement को छोड़ने की तैयारी कर चुके थे.

RPI के नेताओं का मानना था कि यह जो फुले शाहू आंबेडकर की विचारधारा ठीक है ,सही है मैं सहमत भी हूँ ,लेकिन इस विचारधारा से हम MLA नहीं बन सकते MP नहीं बन सकते तो कांशीराम जी सवाल पूछा करते थे कि क्या MLA MP बनना जरूरी है , तो उनके पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होता था .




इस प्रकार जिन लोगों की देख-रेख में डॉ.बाबा साहब अंबेडकर ने आंदोलन को चलाया आगे बढ़ाया संघर्ष किया वही लोग इस मूवमेंट को आंदोलन को छोड़ने की तैयारी कर चुके थे और बाबा करते-करते बापू के चरणों में आ गए.

ऐसा कांशीराम जी ने महाराष्ट्र के नेताओं और RPI का हाल देखा और उन्होंने निष्कर्ष निकाला।

" जिस समाज की गैर राजनीतिक जड़ें मजबूत नहीं होती हैं ,उस समाज की राजनीति कभी कामयाब नहीं होती है "

साहब कांशीराम जी गैर राजनीतिक जड़ें मजबूत करने के लिए 15 लाख कर्मचारियों का BAMCEF नाम का संगठन बनाया और फुले शाहू आंबेडकर की विचारधारा बहुजन समाज के कर्मचारियों को फुले शाहू अम्बेडकर की विचारधारा बताकर तैयार किया, मान्यवर कांशीराम जी का कहना था ,कि बाबा साहब के संघर्षों की वजह से आरक्षण मिला तथा उसी आरक्षण की वजह नौकरी पेशा करने का मौका मिला, तो बहुजन समाज के कर्मचारियों को समाज को कुछ वापिस भी करना पड़ेगा, इस तरह 6 दिसंबर 1978 को BAMCEF (The All India Backward And Minority Communities Employees Federation) की स्थापना की .



BAMCEF के माध्यम से संगठित होने के बाद संघर्ष करने के लिए सन 1981 मे DS4 ( दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) की स्थापना की .

उन्हीनें नारा दिया… … .

"ठाकुर बामन बनिया छोड़,बाकि सब है DS4"

DS4 के माध्यम से कांशीराम जी ने एक बड़ा आंदोलन Movement खड़ा करने की DS4 के माध्यम से खड़ा करने की कोशिश की .

इसके बाद 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की, तथा सामाजिक परिवर्तन आर्थिक मुक्ति राजनीति के माध्यम से संघर्ष आरंभ किया, और BSP बनने के 10 साल बाद 3 जून 1995 को बहुजन समाज पार्टी की पहली सरकार उत्तर प्रदेश में बनी जिसकी मुख्यमंत्री माननीय सुश्री बहन कुमारी मायावती जी बनी , और 1996 में बहुजन समाज पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा मिला, उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की 4 बार सरकार बनी , 4 ही बार बहन जी को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला ।

यह सब कांशीराम जी का 0 से राष्ट्रीय पार्टी बनाने का सफर था .

यह सफर आसान नहीं था इसके पीछे कांशीराम जी का बहुत बड़ा त्याग बलिदान रहा ,कांशीराम जी जब इस फुले शाहू अंबेडकर के आंदोलन को आगे की शुरुआत कर रहे थे तो ना तो उनके पास संगठन था ना पैसा था कांशीराम जी ने इस कारवां को आगे बढ़ाते समय उन्होंने 3-4 दिन की सूखी रोटी खाई, मुर्दों की उत्तरण पहनी तथा 5000 किलोमीटर साइकिल चलाकर 2000 किलोमीटर पैदल चलकर इस कारवां को आगे बढ़ाया .

कांशीराम जी अक्सर बोला करते थे… …

"सामाजिक क्रांति की चेतना दिल की गहराईयों से आती है, यह एक ऐसा तथ्य है,जो नौजवानों को इस बात के लिए प्रेरित करता है,कि वे सामाजिक आंदोलन में अपना योगदान दें "

अगर कांशीराम साहब नहीं होते तो शायद डॉ अंबेडकर नहीं जान पाते अगर इस भारत देश में सबसे बड़ा अंबेडकरवादी था तो वे कांशीराम थे, कांशीराम जी से बड़ा अंबेडकरवादी कभी पैदा नहीं हुआ .

कांशीराम साहब ने कहा था… ..

हमारा अंतिम लक्ष्य इस देश के बहुजन समाज को शासक बनना है।
यही मान्यवर कांशीराम साहब का अन्तिम उद्देश्य था .