Thursday, 31 May 2018

हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?

सभी साथियों को जय भीम
उजाले की ओर का Part 4 लिख रहा हूं पिछले Part 3 जब आप पड़ेंगे तब आपको part 4 अच्छे से समझ आएगा उजाले की ओर के सभी Parts पड़ने के लिए इस पर Click करें  
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हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?
हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?

पूना समझौते के बाद बाबा साहब के गांधी और कांग्रेस से उठा विश्वास :-

पूना समझौते (Puna Pact) के बाद बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को थोड़ा विश्वास हो गया था कि, गांधी और कांग्रेस तथा हिंदू महासभा के प्रयासों से दलित वर्ग को हिंदू समाज में सम्मानजनक स्थान मिल जाएगा । लेकिन बाबा साहब का यह विश्वास जल्दी ही टूट गया, जब महात्मा गांधी ने दलितों को हरिजन नाम की गाली से संबोधित करना शुरू कर दिया । गांधी जी ने उसी वर्ष हरिजन सेवक संघ (Harijan Sevak Sangh) की स्थापना की थी, हरिजन सेवक संघ का अध्यक्ष गांधी ने उद्योगपति घनश्याम दास बिडला को बनाया था । गांधी जातिभेद और वर्ण व्यवस्था पर सदैव समर्थन करते रहें । वर्णाश्रम Varnashram को गांधी हिंदू धर्म का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग मानते थे । गांधी ने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में जाति प्रथा को श्रेष्ट बताया था । गांधी ने लिखा था कि, जाति प्रथा (Caste system) से समाज में स्थिरता कायम रहती है, गांधी व्यक्तियों द्वारा पैतृक व्यवसाय Ancestral occupation करने के सिद्धांतों को सही मानते थे  ।
 बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जल्द ही समझ गए कि पूना पैक्ट दलितों और सवर्णों के बीच व्याप्त दूरी को मिटाने का समझौता नहीं है । यह समझौता गांधी ने दलितों के राजनीतिक अधिकार छीनने (Snatch political rights) के लिए किया है । 3 वर्ष बीत जाने के बाद भी गांधी कांग्रेस और हिंदू महासभा ने दलितों के उत्थान के लिए ऐसे संतोषजनक प्रयास नहीं किए जिससे दलित वर्ग हिंदू वर्ग का अभिन्न अंग बन जाये ।

बाबा साहब दलित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक हर स्तर पर बराबरी और समानता का व्यवहार चाहते थे । उनको 1935 तक पूरा विश्वास हो गया था कि ब्राह्मण धर्म जिसे हिंदू महासभा और कांग्रेस कुछ वर्षों से नए नाम हिंदू धर्म के नाम से पुकारने लगी है । इस हिंदू धर्म में ब्राह्मण के सिवाय किसी भी वर्ग या जाति को कभी समानता नहीं मिल सकती क्योंकि हिंदू धर्म का सामाजिक उद्देश्य ही  असमानता Inequality है, हिंदू धर्म कई मंजिली इमारत जैसा है, जिसमें ना तो दरवाजे हैं ,और ना ही सीड़ियाँ। जो जिस मंजिल पर पैदा हुआ है उसे उसी मंजिल पर मरना है । यानि यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण जाति में पैदा हुआ है तो कितने भी खराब काम करने के बाद भी वह ब्राह्मण ही बना रहेगा, और सामाजिक स्तर (Social level) पर उस ब्राह्मणों का सम्मान भी मिलता है रहेगा । लेकिन यदि कोई व्यक्ति शूद्र अछूत समाज में पैदा हुआ है ,तो उसे  जीवन भर उसी जाति में रहना पड़ेगा, और जीवन भर जातिगत अपमान भी सहना पड़ेगा। बाबा साहब को पूरा विश्वास हो गया था कि जात पात तोड़क मंडल जैसी सामाजिक संस्थाओं Social institutions के प्रयास कभी सफल नहीं होंगे, क्योंकि हिंदू धर्म उस जहर के समान है, जिस जहर को अमृत बनाना संभव नहीं है ।

बाबा साहब ने की हिन्दू छोड़ने की घोषणा :-

  इसीलिए अंत में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने 13 अक्टूबर सन 1935 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि, मेरे अभागे भाइयों और बहनों जब मैं मुड़कर अपने आंदोलन के 10 सालो पर  नजर डालता हूं ,तो भविष्य के लिए चिंतित हो जाता हूं, बहुत हो चुका अब हम चुपचाप नहीं बैठेंगे समय आ गया है, जब हम इन दमन और तिरस्कार Disdain की जंजीरों को तोड़ दे, जात-पात के इस दलदल से बाहर निकल आइये, जिसने हमें बद से बदतर जिंदगी दी । सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकल आइये, और चुन लीजिए ऐसे धर्म को जो हमें बेहतर अवसर और समानता का अधिकार दे, दुर्भाग्य से मैं एक हिंदू अछूत के रूप में पैदा हुआ हूं, इसे रोकना मेरी शक्ति से बाहर था। लेकिन इन अपमान जनक Offensive परिस्थितियों में जीने से इनकार करना मेरी शक्ति में शामिल है। हालांकि मैं हिन्दू पैदा हुआ हूं लेकिन मैं भरोसा दिलाता हूं आपको कि एक हिंदू के रूप में हरगिज नहीं मरूँगा ।
 हिंदू धर्म त्यागने की ऐतिहासिक घोषणा के बाद बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संसार के सभी धर्मों का अध्ययन किया और 21 साल बाद बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया ।
इसे भी पड़े  सन 1910 की जनगणना के आधार पर हिन्दू तथा गैर हिन्दू तथा पूना पैक्ट

Monday, 28 May 2018

सन 1910 की जनगणना के आधार पर हिन्दू तथा गैर हिन्दू तथा पूना पैक्ट

सन 1910 की जनगणना के आधार पर हिन्दू  तथा गैर हिन्दू तथा पूना पैक्ट

1910 hindu gair hindu
1910 जनगणना के आधार पर हिन्दू गैर हिन्दू

सन 1910 में धर्म पर आधारित जनगणना में अंग्रेजों ने दलित, आदिवासी ,सिख ,जैन और बौद्ध समुदाय को हिंदू नहीं माना था बल्कि इन समुदायों को हिंदू धर्म से अलग समुदाय माना था
क्योंकि जनगणना Census आयुक्त ने केवल उन लोगों को हिंदू माना जिनके हिंदू होने पर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं था जनगणना के अनुसार:-
ब्राह्मण की श्रेष्ठता पर विश्वास करते हैं वे हिंदू है ।
  1. जो ब्राह्मणों (Brahman)या मान्य गुरुओं से गुरु मंत्र लेते हैं वह हिंदू है।
  2. जो वेदों का प्रमाणित ग्रन्थ Certified texts मानते हैं वे हिंदू हैं।
  3. ब्राह्मण Brahman जिनके यहां पुरोहिताई करते हैं वे  हिंदू हैं।
  4. जो हिन्दू देवी-देवताओं (Gods and Goddesses) की पूजा (worship) करते हैं वे हिंदू है।

1910 में जनगणना आयुक्त ने दलितों की हिंदुओं से अलग जनगणना की क्योंकि जनगणना आयुक्त ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें कारण स्पष्ट किया गया था:-
  1. जो ब्राह्मणों से गुरु मंत्र (गुरु दीक्षा Guru initiation) नहीं लेते उन्हें हिंदू नहीं माना।
  2. ब्राह्मण जिनके पारिवारिक Famiy पुरोहित नहीं है वे हिंदू नहीं है।
  3. जिनका कोई भी ब्राह्मण पुरोहित नहीं होता वे हिंदू नहीं है।
  4. जिन्हें हिंदू मंदिरों के अंदर जाने नहीं दिया जाता उन्हें जनगणना आयुक्त ने हिंदू नहीं माना।
  5. जो गाय का मांस खाते (Beaf) हैं और गाय की पूजा नहीं करते है वे हिंदू नहीं है।
वैसे तो बाबा साहब बचपन से ही दलित वर्ग की दुर्दशा पर चिंतित थे लेकिन जब वे पड़ लिख गए उन्हें भारतीय इतिहास और साहित्य का ज्ञान हो गया। तब उनके मन में इस दलित वर्ग का उत्थान करने की इच्छा हुई पढ़ाई  पूरी करने के बाद बाबा साहब दलितों की समस्यायें (Problems) सरकार के सामने रखने और दलितों की हर स्तर पर समानता दिलाने के लिए 20 जुलाई 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की। सन 1927 में साफ पानी पीने के अधिकार के लिए महाड सत्याग्रह किया। 25 दिसंबर 1927 को हिंदुओं के काले कानून मनुस्मृति को जलाया। सन1930 में बाबा साहब ने नाशिक कालाराम मंदिर में पूजा करने के लिए सत्याग्रह किया ।
बाबा साहब का कहना था कि यदि सवर्ण हिंदू दलितों को हिंदू मानते हैं तो हमें मंदिरों में पूजा करने का अधिकार भी मिलना चाहिए परिणाम स्वरुप 21 अप्रैल 1932 को कालाराम मंदिर के दरवाजे खुलवाने का सरकारी आदेश Government order हुआ फिर भी पंडित पुजारी दलितों के मंदिरों में पूजा करने का विरोध करते रहे।

पूना समझौता (Puna Pact)

पूना पैक्ट 1932- ambedkar- Ganghi
पूना समझौता 1932
भारतीय लंबे समय से  स्वराज्य की मांग कर रहे थे इसी मांग को पूरा करने के लिए अंग्रेज सरकार ने सन 1930-31 में लंदन में गोलमेज सम्मेलन Round Table Conference बुलाया डॉ भीमराव अंबेडकर दलित वर्ग की प्रतिनिधि Representative बनकर लंदन गए गोलमेज सम्मेलन में डॉ भीमराव अंबेडकर ने भाषण देते हुए कहा:-
दलित वर्ग यह 4 करोड़ 30 लाख लोगों का अथवा ब्रिटिश की भारत की जनसंख्या का पांचवा भाग है दलित वर्ग अपने में एक अलग वर्ग है वह मुसलमानों से स्पष्ट रुप से भिन्न और अलग है । यद्यपि दलित वर्ग Depressed classes के लोगों की गिनती हिंदुओं में की जाती हैं ,तो भी दलित वर्ग किसी भी तरह से हिंदू जाति का एक हिस्सा नहीं है । इतना ही नहीं दलित वर्ग का अलग अस्तित्व है”
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलन में भारतीयों के लिए स्वराज्य की मांग रखी तथा दलित वर्ग का हिंदू वर्ग से अलग अस्तित्व (separate entity) की मान्यता देते हुए अलग चुनाव क्षेत्रों की मांग रखी। गोलमेज परिषद ने दलित (अछूतो) के लिए विधान परिषद में अलग चुनाव क्षेत्रों की सिफारिश की थी।

दलितों के अलग चुनाव क्षेत्र (Separate constituencies) के विरोध में गांधी जी :-


 प्रथम गोलमेज सम्मेलन में गांधी और कांग्रेस ने भाग नहीं लिया लेकिन दूसरे सम्मेलन में गांधी ने भाग लिया और अपनी अमानवीय सोच का परिचय देते हुये दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र और राजनीतिक अधिकार देने का डटकर विरोध (Against) किया ।
गांधी जी का कहना था कि “ दलित वर्ग (अछूत वर्ग) हिंदू धर्म का एक ही हिस्सा है इसलिए अछूत वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग नहीं किया जा सकता इसलिए मैं दलित वर्ग और हिंदुओं में राजनीतिक रूप से बंटवारे के मैं खिलाफ हूँ” गांधी जी ने यह भी कहा कि” मैं प्राणों की बाजी लगाकर इस तरह के राजनीतिक बंटवारे का मैं विरोध करूंगा”
गांधीजी के कड़े विरोध के बावजूद ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैम्जै मैकडोनाल्ड ने डॉ भीमराव अंबेडकर के तर्क पक्ष और मांग को सही मानते हुये, 16 अगस्त 1932 को दलित वर्ग को हिंदुओं से अलग वर्ग मानते हुए, दलित वर्गों को राजनीतिक अधिकार देते हुये, उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्रों (Separate constituencies) का प्रावधान किया ।
दलित वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग वर्ग की मान्यता मिलने और  दलित वर्गों को राजनीतिक अधिकार मिलना गांधी जी को सहन नहीं हुआ और गांधी ने दलित वर्ग के लिए हिंदू वर्ग से अलग मान्यता मिलने और दलित वर्गों के लिए विधान मंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्र मिलने के विरोध में पूना के यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया ।

कांग्रेसियों ने पूना पैक्ट के विरोध में दलितों के साथ किए अत्याचार :-


गांधी की मांग थी कि दलित वर्गों को जो राजनीतिक अधिकार स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र मिले हैं उन्हें समाप्त कर दिया जाये। यरवदा जेल में गांधी के अनशन (Hunger-strike) के कारण पूरे देश में कांग्रेसियों ने अंबेडकर का विरोध करना शुरू कर दिया, दलितों के साथ मारपीट तथा हत्यायें, आगजनी करना शुरू कर दिया, दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिए गए। यह सब कांग्रेसी इसलिए कर रहे थे कि ताकि बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर दलितों को मिले राजनीतिक अधिकार  political rights को छोड़ देवे।

बाबा साहब अलग निर्वाचन क्षेत्र(Separate constituency) छोड़ने   को हुये मजबूर :-


कांग्रेसी बाबा साहब से गांधी से बात करने का अनुरोध भी कर रहे थे अंत में देश में शांति और दलितों की जान माल की रक्षा के लिए डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने पुणे की यरवदा जेल में जाकर गांधी से मुलाकात की लंबी बातचीत के बाद डॉ.अंबेडकर ने विधानमंडलों में मिले अलग निर्वाचन क्षेत्र के प्रस्ताव को छोड़ दिया और बदले में दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के मुआवजे के रूप में राजनीतिक आरक्षण स्वीकार कर लिया। समझौते के तहत दलित वर्ग को विधानमंडल में सुरक्षित क्षेत्र प्रदान किए गये यानि जो क्षेत्र दलितों के लिए सुरक्षित क्षेत्र (Safe zone) से गए उनमें केवल दलित वर्ग के प्रत्याशी खड़े हो सकेंगे लेकिन सभी वर्ग के मतदाता वोट डालेंगे ।
 24 सितंबर 1932 को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और गांधी के बीच एक समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट यह पूना समझौता के नाम से जाना जाता है इस समझौते पर दलित वर्ग(अछूत वर्ग) की तरफ से डॉ अंबेडकर ने तथा सवर्णों की तरफ से मदन मोहन मालवीय ने हस्ताक्षर Signature किए । इसके बाद गांधी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया ।

पूना पैक्ट समझौते के बाद बाबा के विचार :-


पूना समझौते को कांग्रेस ने सवर्ण हिंदुओं और दलितों के बीच व्याप्त दूरी को मिटाने का समझौता बताया था इस समझौते के समय गांधी ने डॉक्टर अंबेडकर को वचन दिया था कि मैं देश से छुआछूत को दूर करने का प्रयास करूंगा और दलित वर्ग और सवर्ण हिंदुओं के बीच व्याप्त कटुता और दूरी को दूर करने का प्रयास करूंगा ।
पूना समझौते होने के बाद 25 सितंबर सन 1932 को मुंबई में हुई अंतिम हिंदू कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर अंबेडकर ने चिंता व्यक्त की थी कि “ हमें चिंता है तो इस बात कि है कि क्या हिंदू जाति इस समझौते का पालन करेगी, हम अनुभव करते हैं कि दुर्भाग्य से हिंदू जाति की एक इकाई नहीं है” बाबा साहब ने यह भी कहा था कि “ चुनाव संबंधी कोई भी व्यवस्था बड़ी सामाजिक समस्या social problem का हल नहीं हो सकती, इसके लिए राजनीतिक समझौते मात्र पर्याप्त नहीं है मैं आशा करता हूं कि आपके लिए संभव होगा कि आप इसे राजनीतिक से आगे बढ़कर ऐसा कर सके जिसमें दलित वर्ग के लिए न केवल हिंदू समाज का एक हिस्सा बने रहना संभव हो जाए बल्कि उसे समाज में सम्मान और समानता का दर्जा (Level of equality)प्राप्त हो”
 

Tuesday, 22 May 2018

जानिए दलित अछूत क्यों और कैसे बनें........

सभी के लिए जय भीम

सबसे पहले मैं सभी से माफ़ी माँगना चाहता हूँ exam होने के कारण में articles नहीं लिख सका लेकिन अब में उजलें की ओर Part 2 प्रकाशित करने जा रहा हूँ जिसका topic हैं “ जानिए दलित अछूत क्यों और कैसे बनें ” यह  Article  अच्छे से समझने के लिए Part 1 क्या दलित हिन्दू शुद्र है?  पड़े तब यह article ठीक से समझ आएगा
दलित अछूत कब बनें
दलित अछूत कब बनें
गाय को पवित्र पशु समझा जाता था यज्ञों  में गाय की बलि दी जाती थी ऋग्वेद (दस 91.14) में कहां गया है ,कि अग्नि देवता के लिए  घोड़ों ,साड़ों , गायों और भेड़ों की बलि दी जाती थी . गाय को खड़ग या कुल्हाड़े से वध Slaughter किया जाता था। ब्राह्मण सहित सभी वर्ग के लोग गाय का मांस खाते थे जैसा कि बौद्ध ग्रंथों में लिखा है कूटदंत ब्राह्मण जब तथागत गौतम बुद्ध की शरण में जाता है तो तथागत से कहता है!
  मैं पूजनीय गौतम बुद्ध की शरण में जाता हूं हे!गौतम मैं 700 बैलों बछड़ों को छोड़ता स्वतंत्र करता हूं, मैं उन्हें जीवन दान देता हूं , वे घास खाए ,ठंडा पानी पिए ,और ठंडी हवा उनके चारों ओर चले ।
बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में कौशल नरेश प्रसन्नजीत द्वारा कराए गए यज्ञ का वितरण है,जिसमें  सांडों ,बछड़ों बकरों की बलि दी जाती थी ।
छितरे हुये लोगों को मृत गायों का मांस खाना पड़ता था, जो मजबूरी में मृत गायों और पशुओं को गांव और शहर के बाहर फेंकने का काम Work करते थे ।
लेकिन गुप्त काल में 400 ईसवी के आसपास गुप्त राजाओं ने गाय के वध पर प्रतिबंध लगा दिया,गाय का वध करना महापातक घोषित कर दिया, इसलिए यज्ञों में गाय की बलि देना बंद हो गया,लोगों ने गाय का मांस खाना बंद कर दिया,लेकिन छितरे हुये लोगों ने मृत पशुओं का मांस खाना बंद नहीं किया, क्योंकि गांव की सफाई के लिए मृत पशुओं को गांव से बाहर (outside) फेंकते थे, दूसरे उनके पास खाने को कुछ नहीं था, इसलिए ऐसे छितरे हुये लोगों को वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मण धर्म से बहिष्कृत का अवर्ण अछूत घोषित कर दिया गया ,वेद व्यास स्मृति में अंत्यज और अछूत जातियों का वर्णन किया गया है ।

चर्मकार(मोची),भट्ट,(सिपाही),भील्ल,रजक (धोबी),पुष्कर,नट,मेड,चांडाल,दास, स्वापाक, कोलिक ये अंत्यज(Endless) के रूप में जाने जाते हैं और दूसरे वे भी जो गाय का मांस खाते हैं।

अपवित्र बना देने के बाद ब्राह्मणों ने इनके मानव होने के अधिकार छीन लिए थे, इनके साथ पशुओं से भी खराब व्यवहार करने लगे थे ,कुत्ते बिल्ली मंदिरों  और तालाबों में जा सकते थे,लेकिन अवर्ण को मंदिरों Temples में जाने का अधिकार नहीं था, ब्राह्मणों ने इनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया था । शादी, विवाह ,जन्म मृत्यु, किसी भी धार्मिक काम में ब्राह्मण इनके यहां पुरोहिताई या पूजा पाठ के लिए नहीं जाते थे , इसलिए दूसरे लोग भी इनका सामाजिक बहिष्कार करने लगे थे ।

ब्राह्मण धर्म से बहिष्कृत  Excluded कर दिए जाने के बाद दलित समाज अपने आप में एक स्वतंत्र समाज बन गया था, दलितों के अपने कुल देवताओं के मंदिर या चबूतरे हुआ करते थे,और आज भी होते हैं,जहां दलित वर्ग के लोग पूजा-पाठ Worship इत्यादि करने इन्हीं मंदिरों या चबूतरों पर जाते थे । दीपावली रक्षाबंधन त्योहारों पर दलितों के घर में उन्हें कुल देवताओं की पूजा होती थी,और आज भी अधिकतर दलितों के घरों में त्यौहारों Festival पर इन्हीं कुल देवताओं की पूजा होती है। दलित समाज में अपने पुरोहित (में -भरिया)  हुआ करते थे । जो पूजा पाठ का काम करते थे ,शादी विवाह वगरैह में दलितों के पुरोहित खुद शादी करवाते थे ।
दलितों में अधिकतर परिवारों में आज भी वैदिक रीति रिवाज से शादी नहीं कराई जाती, दलित परिवार में आज भी बगैर वेद मंत्रों के और बगैर ब्राह्मणों के लोकरीति (Folkity) से शादी कराई जाती है आज भी अधिकतर दलित वर्ग के लोग ब्राह्मण धर्म नहीं मानते ।
 ब्राह्मण धर्म में ऐसे नियम बनाए गये , जिनसे शूद्र वर्ग पिछड़ा वर्ग सभी वर्ग की महिलाएं तथा बहिष्कृत वर्ग को अज्ञानी और अशिक्षित(uneducated) बनाकर रखा जा सके,ताकि इनका राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और ,शारीरिक शोषण किया जा सके ।
मनुस्मृति के भाग 2 के श्लोक क्रमांक 67 में लिखा है:-
वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारों वैदिक: स्मृत।
पति सेवा गुरौ वसौ ग्रहार्थी अग्नि परिक्रमा ।।
अर्थात:- जैसे शूद्रों के लिए गुरु दीक्षा संस्कार करना मना है , उसी प्रकार स्त्रियों के लिए पढ़ना पढ़ाना (Teaching to read) गुरु दीक्षा लेना मना है ,पति की सेवा करना ही स्त्रियों की सुबह शाम की पूजा और अग्नि होम हैं ।
बहुत बाद में महात्मा फुले और अन्य महापुरुषों के संघर्ष के कारण जब दलित वर्ग शुद्र वर्ग (पिछड़ा वर्ग OBC)तथा सभी वर्ग की महिलाओं को पढ़ने-लिखने का अधिकार तथा मौका मिला तो स्कूलों में ही उस समय Mostly ब्राह्मण धर्म का साहित्य पढ़ाया जाता था,इसलिए कम पढ़े लिखे लोग ब्राह्मण धर्म की तरफ आकर्षित हुए और ऐसे कम पढ़े लिखे लोग घरों में रामायण, महाभारत, भगवत गीता आदि पुस्तकें (Book) खरीद लाये ,तथा वैदिक देवी-देवताओं के चित्र Photos खरीद लाए और ब्राह्मण धर्म को मानने लगे तथा दलित वर्ग को ब्राह्मण धर्म वैदिक धर्म का चौथा शूद्र वर्ण समझने लगे ।

Tuesday, 1 May 2018

What is Reservation in India

Reservation is a topic which has the most discussion and politics on the subject. Reservation In almost every election there is an electoral issue in some form of reservation.
What is Reservation
What is Reservation ?
Political parties lose and win elections on the issue. The basic purpose of reservation is to overcome the inequality in the midst of different sections and establish a parallel society. Apart from ancient times (old time) in our India country, discrimination was done and injustice has been made. The society was divided into four parts or letters in an unscientific manner. The characters were (Brahmin, Kshatriyya, Vaishya, and Shudra) in the Vedas and in religious books only the Shudras were given the same rights. It is the right to serve selflessness without three letters. In religious books, Shudra Varna has been severely insulted in many places by calling it a lowly character. As Tulsidas wrote in Ramacharit-Manas page number 986 in Chaukhan No. 3.
“Talei, Kumhar Chandal, Bhil, Kol, and Kalwar etc. which are below the characters, after the death of the woman or the property of the house is destroyed, the head shrouts and becomes monk”
They worship themselves with Brahmins. And destroy both the folk with their hands. In ancient times, the Vedas and religious books got the status of the constitution. In these religious books, the king used to rule, the reservation started from this period.

According to Manusmriti, the posts of the priest, the chief adviser of the king, the post of the penalist, and the posts of the ministers were reserved for Brahmins, all important posts were safe for the Brahmins, all the ministers were Brahmins. Non-Brahmin castes could not reach big positions, so the legislation was created to maintain monopoly on education. For the women of lower classes of Hindu society and Brahmins, women studied for the crime and declared a crime, which violated the provision of harsh punishment.
Shloka number 67 of Part 2 of Manusmruti states: -

“ As for the Shudras, it is forbidden to do the initiation (Janau Samskar) of the Guru. In the same way, it is forbidden for women to read and study Guru initiation. In the ancient times, due to such discrimination, due to lack of full governance and lack of education, the condition of all the tribals, backward classes and all the dalit women became so pathetic and thought that this example could not be found elsewhere in the world. It was also difficult for the Dalit class to stay alive. The people of the dalit class could not do good work and neither the dalit class could worship in the temples, nor could they drink water in ponds and neither could they lay foot on many public roads. While such a deal was not done with dog cat and other animals.

For thousands of years women (of all classes), tribals, Dalits and Backward classes continue to thrive in the mill of this religious injustice. Many kings in the country became kings and rulers, but no one tried anything to overcome this religious injustice. Because all kings of Maharashtra respected Vedas, Puranas and religious literature very much. That is why the Vedas could not raise the courage to take any action against the Puranas, and the kings were also told that the Vedas came out of the mouth of Brahma, therefore it is not to obey the words of Vedas and Puranas. Do not believe in God's order. That is why no king or ruler could dare to remove this religious and social injustice.

But in the beginning of the 20th century, King Shahuji Maharaj of Kolhapur principality dared to go against the Vedas and Puranas and dedicated the administration of Kolhapur concession without the welfare of the entire people without discrimination.

Chhatrapati Shahu ji Maharaj
Chhatrapati Shahu ji Maharaj
Chhatrapat Shahuji Maharaj gave an order on 26th July 1902, under which provision of 50% reservation for the backward class and the weaker sections in the government offices of the principality was provided. In this way, the reservation of reservation for the Nivas of India started.
Shahu Ji Maharaj wanted that many
Education for the people of the class, so that the school also opened in every country. Shahuji Maharaj sent Baba Saheb to c with financial help to complete his incomplete education so that Baba Saheb could earn the knowledge and do good to the country by giving social and economic equality to the backward classes and the weaker sections in the country.
Reservation given by Chhatrapati Sahu Ji Maharaj was limited to the Kolhapur concession, but Dr. Bhimrao Ambedkar wanted to establish an equitable society by ending social and economic injustice across the country.
About 150 years have passed since the British rule in the country. I have been demanding Swaraj for a long time, for which the British Government called Round Table Conference in London in 1930-1931. Baba Saheb participated in the Round Table Conference from Dalits
At the Round Table Conclave Baba Saheb said in his speech: - "In place of the English bureaucratic government in India, people should be formed by people, for the people"

Round table Confrence in Dr.ambedkar And Gandhiji
Round Table Conference

Baba Saheb Dr. Ambedkar demanded the Swaraj for the Indian from the British Government and demanded separate constituencies in the Legislatures for the Dalits.
Baba Saheb believed