Sunday, 9 September 2018

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

Dr.ambedkar and ramabai
Dr.B.R. Ambedakar and Ramabai Ambedkar

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

कृपया पूरी पोस्ट पढ़े।
जब बड़ौदा के महाराज ने बाबा साहब को वजीफा दिया और बाबा साहब विदेश जा कर पढ़ना चाहते थे तब उनकी पत्नी रमाबाई और 5 बच्चे थे। तो देखिए किस प्रकार से बाबा साहब अपनी बात रमाबाई के सामने रखते हैं।

बाबा साहब - रमा बड़ौदा के महाराज ने मुझे वजीफा दिया है और मैं विदेश जा कर पढ़ना चाहता हूं लेकिन जब मैं तेरी तरफ मुड़कर देखता हूं तेरे पास 5 बच्चे हैं आमदनी का कोई साधन नहीं है और मैं भी तुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहा हूं क्या ऐसी परिस्थिति में तू मुझे विदेश जाकर पढ़ने की अनुमति देगी।

रमाबाई - बाबा साहब यह बात सच है कि मेरे पास 5 बच्चे हैं और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है और आप भी मुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहे हो लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाती हूं आप अपनी इच्छा को पूरी करके आना आप अपनी पढ़ाई को पूरी करके आना इन 5 बच्चों का पेट मैं खुद पाल लूंगी, और जब माता रमाबाई बाबा साहब को भरोसा दिलाती हैं तो बाबासाहब विदेश चले जाते हैं और अपनी पढ़ाई करते हैं और इधर माता रमाबाई अपने 5 बच्चों के पेट को पालने के लिए क्या करती है ।

माता रमाबाई मुंबई की गलियों से गोबर उठा कर लाती उसके बाद उपले बनाकर मुंबई की गलियों में उपले बेच कर आया करती और उससे जो पैसा आ जाता अपने बच्चों का पेट पालती है ।
इतना पैसा नहीं आता था कि वह अपने बच्चों की परवरिश कर पाती देखते ही देखते उनका बड़ा बेटा दामोदर बीमार हो गया। इलाज के पैसे नहीं थे इलाज के अभाव के कारण दामोदर इस दुनिया को छोड़ कर चला गया। यह बात माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई।

         (बाबा साहब द्वारा भेजा गया पत्र)

नानकचंद रत्तू खत पढ़ते हुए- बाबा साहब कहते हैं । कि रमा मैं यहां अगर एक वक्त का खाना खाता हूं तब भी मेरा काम नहीं चल पा रहा है मैं अपना जीवन बड़ी मुश्किल में व्यतीत कर रहा हूं में अपना सुबह का नाश्ता दोपहर में करता हूं और शाम को मैं पानी पीकर अपना काम चला रहा हूं और मैं जानता हूं कि तेरे सामने भी बहुत विफल परिस्थितियां हैं तेरे पास पांच बच्चे हैं  और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है फिर भी अगर हो सके तो कुछ पैसा भिजवा देना

इधर माता रमाबाई ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसा इकट्ठा किये थे। लेकिन उनकी बेटी इंदु बीमार हो जाती है अब माता रमाबाई के सामने एक बहुत बड़ा सवाल था कि वे उस पैसे से अपनी बेटी का इलाज कराएं या अपने पति को दिए गए वचन को निभाएं लेकिन एक मां ने फैसला किया और वह पैसा बाबा साहब को भेज दिया और इधर उनकी बेटी इंदू ने भी दम तोड़ दिया और यह बात भी माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई और बाबा साहब पढ़ते रहे और कुछ समय के बाद बाबा साहब अपनी पढ़ाई छोड़कर बड़ौदा के महाराज की रियासत में नौकरी करने के लिए आते हैं तो रमाबाई खुश होती है और क्या कहती है।

रमाबाई - अब तो मेरा पति डॉक्टर बन के आ रहा है अब मेरा पति नौकरी करेगा तनखा कमा कर लाएगा अब तो अपने बच्चों को मैं भरपेट खाना खिलाऊंगी अब तो मेरी जिंदगी के दिन बदल जाएंगे।

बाबा साहब जब दफ्तर में प्रवेश करते हैं।

चपरासी - टाट को खींच लेता है और पानी के घड़े को उठाकर अलग रख देता है ।

बाबा साहब - अरे चपरासी  जरा मुझे फाइल तो लाकर देना
चपरासी - फाइल को भी डंडे से उठा कर देता है।
बाबा साहब क्या बदतमीजी है यह क्या हो रहा है तू एक चपरासी होकर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है।

चपरासी - अंबेडकर तुम पढ़-लिख जरूर गए हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम हमारी बराबरी पर आ गए हो तुम आज भी नीच हो और तुम्हारे साथ में काम करके अपना धर्म नष्ट नहीं कर सकता

बाबा साहब - क्या मतलब मेरे साथ तेरा धर्म कैसे नष्ट हो सकता है और तू जानता है कि मैं तुझे नौकरी से निकाल सकता हूं ।

चपरासी - अंबेडकर यह बात में अच्छे से जानता हूं और तुम मुझे नौकरी से भले ही निकाल दो लेकिन मैं तुम्हारे साथ रहकर इस दफ्तर में काम नहीं कर सकता।

बाबा साहब मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर और अधिक नौकरी नहीं कर सकता।

संचालक - बाबा साहब ने 11वें ही दिन अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने घर के लिए निकलते हैं और बड़ौदा के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाते हैं वहां उनकी ट्रेन 4 घंटे लेट होती है तो बाबा साहब एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं और क्या कहते हैं।

बाबा साहब - मैं पहले यह सोचता था कि हमारे लोग मरे पशुओं को उठाते हैं उनकी खाल खींचते हैं और उनका मांस खाते हैं हमारे लोग दूसरों की टट्टी को अपने सर ऊपर उठाकर फेंकने का काम करते हैं मेरे लोग गंदे रहते हैं उनके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं है और उनके पास पैसा भी नहीं है तो हो सकता है यह लोग हमारे लोगों से इसलिए ऐसा व्यवहार करते हैं हो सकता है  यह लोग हमारे लोगों को इसीलिए नीच कहते है लेकिन आज तो मैंने यूरोप के कपड़े पहने हैं अमेरिका और जापान की यूनिवर्सिटियों से शिक्षा प्राप्त की है और एक अधिकारी बनकर मैं यहां आया हूं जब ये मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो जो मेरे समाज के अशिक्षित और अनपढ़ लोग हैं तो ये लोग उनके साथ कैसा व्यवहार करते होंगे (रोते हुए) अगर मैं अपने समाज को इस ग़ुरबत और गुलामी से आजाद नहीं करा पाया तो मैं वापस बड़ौदा लौट कर नहीं आऊंगा और मैं खुद को गोली मार लूंगा।

बाबा साहब जब नौकरी छोड़कर अपने घर पहुंचते हैं और यह बात रमाबाई को पता चलती है तो रमाबाई को बहुत दुख होता है।

बाबा साहब - रमा मैं नौकरी तो करना चाहता था लेकिन वहां का चपरासी मुझे फाइल डंडे में बांध कर देता पानी के घड़े को उठाकर अलग रख लेता और वहां के लोगों ने भी मुझे मारने की योजना बनाई मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर नौकरी नहीं कर सकता था इसीलिए मैं नौकरी छोड़ कर चला आया।

रमाबाई - बाबा साहब आपको जैसा अच्छा लगे आप वैसा ही काम करें मैं आपके साथ हूं।

फिर बाबा साहब को अपनी अधूरी पढ़ाई और बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर लिए गए संकल्प का ख्याल आता है तो बाबा साहब फिर से विदेश जाकर हम सब की गुलामी का कारण जो हिंदू धर्म के ग्रंथों में लिखा हुआ है उसे खोजते हैं इधर उनका तीसरा बेटा रमेश भी इस दुनिया को छोड़ कर चला जाता है इस प्रकार से बाबा साहब के तीन बच्चे कुर्बान हो जाते हैं। और जब बाबा साहब विदेश से लौट कर आते हैं और हमारी गुलामी व नीचता का कारण हमें बताते हैं।

बाबा साहब - मैं कड़ी मेहनत और लगन से यह जान पाया हूं। कि हमारे समाज के लोगों के साथ जो नीचता भरा और गुलामी का व्यवहार हो रहा है उसका कारण हिंदू धर्म के जो ग्रंथ हैं उनमें लिखा हुआ है और मैं आज यह घोषणा करता हूं कि 25 दिसंबर सन 1927 को पूरी देश की मीडिया को सूचना देकर इस हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सब को आजाद कर दूंगा।

संचालक - और बाबा साहब 25 दिसंबर सन 1927 को हजारों लाखों की संख्या के सामने हिंदू धर्म के ग्रंथों को वह मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सबको हम सबको इस नीचता और जिल्लत भरी जिंदगी से आजाद करते हैं और कहते हैं ।

25 दिसंबर 1927
बाबा साहब - मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मान सकता जो अमानवीय है और आज के बाद ऐसा कोई भी विधान  व कोई भी कानून मेरे समाज के लोगों पर लागू नहीं होगा जो अमानवीय है क्योंकि यह विधान जबरजस्ती हमारे समाज के लोगों पर थोपा गया हैं।

ऐसा कहकर बाबा साहब मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा देते हैं और आप सबको आजाद करा देते हैं उसके बाद बाबा साहब मुंबई की कोर्ट में वकालत करते हैं तो उनका जो चौथा बेटा होता है राजरतन वह बीमार हो जाता है देखिए वह दृश्य।

रमाबाई - नानकचंद रत्तू जाओ जल्दी से बाबा साहब को बुलाकर लाओ क्योंकि हमारा जो बेटा है राजरतन वह बहुत बीमार है और वह लंबी लंबी सांसे ले रहा है।

नानकचंद रत्तू - बाबा साहब बाबा साहब जल्दी से घर चलिए आपके पुत्र राजरतन की तबीयत बहुत खराब है और माता रमाबाई ने आपके लिए बुलावा भेजा है।

संचालक - जैसे ही बाबा साहब दौड़कर घर पहुंचते हैं और राजरतन को गोदी में लेते हैं तो राजरतन भी दम तोड़ देता है अपने चौथे बेटे की मौत पर पति के सामने माता रमाबाई क्या कहती हैं।

रमाबाई - रोते हुए बाबा साहब बस करो बाबा साहब अब तो बस करो क्योंकि आपके समाज सुधार की लालसा ने और ज्ञान पाने की लालसा ने मेरा पूरा घर उजाड़ के रख दिया है मैंने एक एक करके अपने 4 बच्चों को दफन कर दिया है बाबा साहब अब तो बस करो ।

बाबा साहब - रमा तू तो मुझे रो करके बता पा रही है मैं तो रो भी नहीं पा रहा हूं मैं तो रोज ऐसे सैकड़ों बच्चों को मरते हुए देखता हूं रमा तू चुप हो जा, रमा तू चुप हो जा।

रमाबाई - बाबा साहब मैंने आज तक आपकी हर बात को माना है और इस बात को भी मान लेती हूं और चुप हो जाती हूं लेकिन आप मुझे इतना बता दो कि आप बड़े फक्र से कहते थे कि तेरा बेटा राज रतन देश पर राज करेगा लेकिन अब यह इस दुनिया में नहीं रहा बताओ यह कैसे इस देश पर राज करेगा बाबा साहब मुझे बता दो कि यह कैसे देश पर राज करेगा।

बाबा साहब - रमा यह सच है कि तेरा यह पुत्र अब इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं और राजरतन के पार्थिव शरीर की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं अपने जीवन में ऐसा काम करके जाऊंगा कि हर रमा की कोख से पैदा हुआ राजरतन और हर मां की कोख से पैदा हुआ बेटा इस देश पर राज करेगा मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं।

इतना कहने के बाद बाबा साहब अपनी जेबों में हाथ डालते हैं और राजरतन के कफन के लिए उन की जेब में एक पैसा तक नहीं होता है इस बात को माता रमाबाई जानती है और रमाबाई अपनी साड़ी का दुपट्टा पार कर राजरतन के ऊपर डाल देती है और बाबा साहब को ख्याल आता आता है कि मुझे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना है और बाबा साहब राजरतन के पार्थिव शरीर को छोड़ घर पर ही छोड़ कर लंदन के लिए निकलते हैं तभी पीछे से उनका भाई दौड़कर आता है और कहता है।

भाई - भीम तू पागल हो गया है यह तेरा पुत्र मरा पड़ा है और तुझे विदेश जाने की सूझ रही है तू कैसा बाप है जो अपने पुत्र को इस अवस्था में छोड़कर विदेश जा रहा है और यह समाज क्या कहेगा अपने पुत्र को कंधा देकर उसका अंतिम क्रिया कर्म तो कर ले।

बाबा साहब - भाई मैं जानता हूं कि यह मेरा पुत्र मरा पड़ा है लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर आज मैं गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन नहीं गया तो गांधी एंड कंपनी के लोग मेरे करोड़ों करोड़ों लोगों को मार डालेंगे के सारे और हक अधिकारों को छीन लेंगे इसलिए मैं एक पुत्र की खातिर अपने करोड़ों करोड़ों लोगों को बलि चढ़ते हुए नहीं देख सकता यहां तुम सब लोग हो तुम सब संभाल लोगे ।

ऐसा कहते हुए बाबा साहब गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन चले जाते हैं और आज आपके जो बच्चे हैं आपका जो समाज है जो हक और अधिकार लेकर जी रहा है अपने बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े अच्छी अच्छी शिक्षा और नौकरियों में भेज रहा है इसका श्रेय केवल और केवल बाबा साहब को जाता है और आपके जो लोग हैं वह इस बात को अपने बच्चों को बताने तक शर्माते हैं।
(JAY BHIM JAY BHARAT)

Monday, 3 September 2018

आखिर कौन है डॉ.अम्बेडकर ?

Dr.ambedkar images 2018
Dr.ambedkar images 2018

आखिर कौन है ये अम्बेडकर?

आरक्षण जनक? जाति संरक्षक? धर्म तोड़क?
अंग्रेजों का सिपहलकार, ब्राह्मणों का दुश्मन?

हिंदुओं का विरोधी? देशद्रोही? या एक खुद्दार नेता?

आखिर कौन है डॉ. अम्बेडकर?

हो सकता है कि कई लोगों को इन शब्दों से आपत्ति हो लेकिन 85 प्रतिशत से भी ऊपर इस देश के लोग बाबा साहेब को इसी रूप में स्थापित और वर्णित करने की कोशिश में लगे हैं। अम्बेडकर तो एक शिक्षक थे, एक वकील थे, राजनेता थे, गुरु थे, डॉक्टर भी थे, समाजसुधारक थे, विचारक थे, चिंतक थे, अर्थशास्त्री थे, ज्ञानी थे, शास्त्री थे, महापंडित भी थे, दूरद्रष्टा थे, एक आम इंसान थे हम सब की तरह। बस बुद्धि तीक्ष्ण थी, सोच विकसित थी और कर्म निष्पक्ष थे।
कल जब एक चतुर्वेदी जी ने वाट्सऐप ग्रुप में यह कहकर आपत्ति लगाई कि एक चमार की फोटो इस ग्रुप में न भेजो तो ग्रुप के 99 प्रतिशत सदस्यों के जैसे जान में जान आई और फिर मुकाबला शुरू हुआ आरक्षण से खत्म हुआ उपरोक्त सभी शब्दों के साथ। यही लगभग पुरे सोशल मीडिया और लोगों की मानसिकता का है। आप किस किस समझोओगे, बहस करोगे?
जब देश का संविधान बना तो लगभग 99.99 प्रतिशत लोगों को यह भी मालूम नही था कि संविधान आखिर होता क्या है। उन्हें यह भी मालूम नही था कि लोकतंत्र और कानून किस भला का नाम है। आज उन्ही की संतानें उसी संविधान और संविधान निर्माता पर सवालिया निशान करने में लगे हैं। अंग्रेजों की मुखबिरी और राजाओं की चाटुकारिता में जिनका पूरा जीवन बीता वो आज देशभक्ति और कानून पर लच्छेदार भाषण सुना रहे हैं। वो आरक्षण को अभिशाप और जातियों को सामाजिक सद्भाव समझते हैं। वो मंदिर के आरक्षण को धर्म और सामाजिक प्रतिनिधित्व को खैरात समझते हैं।
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खैर! ये उनकी भी अभिव्यक्ति की आजादी है अन्यथा अपने देश के कानून और पहचान पर अपने ही समाज व् देश के एक बड़े हिस्से पर शायद ही किसी देश में सवाल उठाये जाते हो। आज सवाल आरक्षण, संविधान या अम्बेडकर का नही है क्योंकि किसी का भी विरोध करना इस देश का फैशन बन गया है। लेकिन मुझे तरस उन लोगों की मानसिकता पर आता है जो तर्क करते हैं कि आरक्षण से काबिलियत वंचित हो रही है। एकलव्य और शम्बूक से काबिलियत छीनने वाले ये मेरिट धारी आज भी किसी दलित को आईएएस बनने से रोकने के लिए रात के अँधेरे में हमला करते हैं। किसने कह दिया कि आरक्षण किसी देश में नही है? उनको बताया गया कि संविधान एक कॉपी पेस्ट है या कहते हैं कि अंग्रेजों के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट का पुलिंदा है।
ऐसे लोग 18 वीं सदी में जी रहे हैं। क्योंकि उन्होंने विश्व के इतिहास को पढ़ा ही नही है, न आरक्षण व् संविधान को। विश्व में जहाँ आरक्षण को ऐफिरमेटिव एक्शन कहते हैं और रंगभेद, नस्लभेद के लोगों को इसका फायदा दिया जाता है, जिनमे विकसित राष्ट्र जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका आदि देश शामिल है। दूसरी बात न वो लोग यह जानते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र विदेशों में नही पाए जाते हैं फिर भी वहां समानता के लिए आरक्षण है जिसका आधार गरीबी नही बल्कि सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक या रंगभेद आधारित भेदभाव और मानसिकता है।
जहाँ तक संविधान के कॉपी पेस्ट का सवाल है तो उन्होंने कभी अपने देश का न संविधान पढ़ा, न इतिहास। एक तरफ जब वो यह मानते है कि आरक्षण विदेशों में नही है तो दूसरी तरफ तर्क देते हैं कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान डॉ अम्बेडकर ने दिया है जो गलत है। यानी उनकी शर्तानुसार संविधान कभी कॉपी पेस्ट है तो कभी गलत या बेकार। बहुत कम लोग जानते हैं कि गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया 1935 जब बना था उसके आधे हिस्से बाबा साहेब की सोच से बने हैं जो भारतीय लोगों की बेहतरी के लिए भारतीय व्यवस्थानुसार थे।
बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के विचारों से  संविधान, आरक्षण के अलावा रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना, हीराकुंड, दामोदर नदी घाटी परियोजना, इलेक्ट्रिक ग्रिड सिस्टम, सेवानियोजन कार्यालय, वित्त आयोग, महिलाओं के समस्त कानून, दलितों, शोषितों और पिछड़ों के विशेष कानून, मजदूरों की कार्य करने की अवधि 14 घण्टे से 8 करना और मातृत्व अवकाश, स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, वयस्क मताधिकार, लोकतंत्र और न जाने सैकड़ों चीजे ऐसी है जो बाबा साहेब ने इस देश को दी है लेकिन लोगों की आंख में धर्म और जाति का काला चश्मा चढ़ा है जिससे आगे कुछ दिखाई देना नामुमकिन है।
भारतीय व्यव्यस्था में जो जब जब सही था उसकी समस्त रुपरेखा संविधान में है। अच्छा और बुरा क्या किया जा सकता है वह समय समय की सरकारों पर निर्भर है। आज जो अतिवाद चल रहा है चाहे वो किसी भी तरफ हो, वो अपने उफान के चरम तक जाएगा अवश्य लेकिन वहीँ से उसकी अंतिम यात्रा भी शुरू होगी। इसलिए अपने देश की धरोहर, राष्ट्रिय प्रतीकों और महापुरुषों के साथ साथ कानून और व्यव्यस्था पर भी गर्व करें, उसे और अच्छा बनाये रखने का संकल्प करें जिससे हम विकसित राष्ट्र का सपना पूरा कर सकें। धन्यवाद।
Source By:- Whatsapp Social Group

Thursday, 12 July 2018

Dr.Amebedkar का बुद्धिज़्म से परिचय कब से और कैसे

Dr.Amebedkar का बुद्धिज़्म से परिचय कब से और कैसे

Buddhism and ambedkar
Dr.Amebedkar and Buddhism
डॉ भीमराव अंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने का एक मुख्य कारण यह भी था कि वे बचपन से ही बौद्ध धर्म से प्रभावित थे ,इसके बारे में बाबा साहब ने “बुद्ध और उनका धम्म “पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ,जिस वर्ष उन्होंने 4th Class परीक्षा उत्तीर्ण की थी तो उनकी जाति के लोगों ने उन्हें बधाई देने के लिए सार्वजनिक सभा Public meeting का आयोजन किया था, सभा के सभापति साहित्यकार और विद्वान दादा केलुस्कर थे सभा के अंत में दादा केलुस्कर ने बालक भीम को बुद्ध के जीवन पर अपनी स्वयं की लिखी पुस्तक भेंट की थी, बालक भीम ने वह पुस्तक बड़े ही चाव से पड़ डाली और पढ़कर अत्यंत प्रभावित influenced एवं द्रवित हुये, बालक भीम ने अपने पिताजी से पूछना शुरु कर दिया कि आप हम सबको बौद्ध साहित्य Buddhist literature से परिचित क्यों नहीं कराते आप हमें महाभारत और रामायण पढ़ने पर इतना जोर क्यों देते हैं ,जो ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की महानता और शूद्रों एवं अछूतों की नीचता को दर्शाने वाले वृतान्तों Annotations से भरे पड़े हैं, बालक भीम पिताजी द्वारा दी गई रामायण,महाभारत की पुस्तकों को पहले भी पढ़ चुके थे, फिर दादा केलुस्कर द्वारा दी गई भगवान बुद्ध की जीवनी (Biography of Lord Buddha) पढ़ने के बाद बुद्ध की ओर मुड़े ,तथा उस अल्प आयु में भी बालक भीम रामायण महाभारत के पात्रों तथा भगवान बुद्ध के चरित्र और ज्ञान की तुलना कर पाते थे, इसी तुलनायक अध्ययन Comparative Study के कारण बालक भीम के मन में Buddha के प्रति में रुचि उत्पन्न हुई तथा हिंदू (ब्राह्मण) धर्म के प्रति विद्रोह भड़का । हिंदू धर्म में व्याप्त वर्ण व्यवस्था और ऊंच-नीच की व्यवस्था, बाबा साहब को कभी रास नहीं आई, बाबा साहब का मानना था, कि जिस तरह भारत देश के लिए स्वराज्य जरूरी है वैसे ही दलित वर्ग के लिए धर्म परिवर्तन जरूरी है क्योंकि दोनों का उद्देश्य Objective आजादी की चाह है । ऐसे अनगिनत कारणों और विशेषताओं के कारण बाबा साहब ने महाराष्ट्र के नागपुर शहर में 14 अक्टूबर सन 1956 को अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी यह एक अद्भुत संयोग है कि मैं यह लाइनें आज 14 अक्टूबर सन 2016 को लिख रहा हूं बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने उपस्थित जनसमूह Crowd को 22 प्रतिज्ञा दिलावायी थी वे प्रतिज्ञाएं है :-
22 प्रतिज्ञाएँ
डॉ.  अम्बेडकर द्वारा दिलायी गई 22 प्रतिज्ञाएँ
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में विशाल जनसमूह के सामने एक महान भाषण में जनता से बौद्ध धम्म में दीक्षित होने का आवाहन किया तथा दलित वर्ग को गंदे कामों को छोड़ने का आह्वान किया तथा खासतौर से महारों को मृत पशुओं का सड़ा गला मांस (Rotten Meat) न खाने की सलाह दी |
15 अक्टूबर सन 1956 को दीक्षाभूमि बाबा साहब ने नव दीक्षित बौद्धों को संबोधित करते हुए कहा कि "आप लोग ऐसे काम करने चाहिए जिन कामों से आप लोगों का अन्य लोगों के मन में आपका आदर बड़े, यह धम्म अपनाकर गले में बोझ लटका लिया है, ऐसा मत समझिए बौद्ध धम्म की दृष्टि से भारत अब शून्यवत है ,इसलिए हमें अच्छी तरह से धम्म का पालन करने का संकल्प Oath लेना चाहिए, यदि हमने यह कर लिया तो हमारे साथ-साथ देश का उद्धार करोगे ,बाबा साहब ने यही कहा था तथागत बुद्ध ने उस समय की परिस्थितियों के अनुसार अपने धम्म को प्रचार का मार्ग तैयार किया था, अब हमें भी योजना बनानी चाहिए इसीलिए हर किसी को हर एक व्यक्ति को दीक्षा देनी चाहिए हर एक बौद्ध व्यक्ति को दीक्षा देने का अधिकार है मैं ऐसा ऐलान Announcement करता हूँ "

Friday, 29 June 2018

बहुजन समाज के लोगों को सावधान रहने की क्यो है जरूरत....

बहुजन समाज के लोगों को सावधान रहने की क्यो है जरूरत....

मनुवादी पार्टियां
मनुवादी पार्टिया

जय भीम
   2019 का  लोकसभा चुनाव करीब आ रहा है  जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहा है ,BJP ,RSS के नेताओं की जुबान मीठी होती जा रही है,प्रधानमंत्री जी संत कबीर जयंती मना रहे है,जिन संत कबीर की विचारधारा से कोई मतलब नहीं रहा वो संत कबीर जयंती मना रहे है ।  असल में यह लोग SC, ST, OBC, तथा धार्मिक अल्पसंख्यक ,मुसलमान, सिक्खों ,ईसाई, बौद्धों को खुश करना चाह रही हैं ,ताकि जिससे Bahujan Samaj के लोग 2019 के लोकसभा Election में वोट डाल दें ।
अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह जी का बयान आया है कि “ अगर कोई आरक्षण आपसे छीने, तो थप्पड़ मार कर वापस ले लो “   ऐसे बयान क्यों आया क्योंकि SC ST तथा OBC बहुजन समाज के लोग हैं ऐसे बयान सुनकर गदगद हो जाये ।
 यह समय चुनावी समय है इसलिए BJP RSS के नेताओं के बहुजन समाज को खुश करने के लिए कई ऐसे बयान आएंगे, और आप कहेंगे कि वाह !क्या बात है हमें आंख कान खोलकर ऐसे Statements से बच के रहना होगा क्योंकि यह BJP RSS के इशारे पर ऐसे बयानबाजी की जाएंगी , ऐसे कई बयान मुद्दे सामने लाकर भड़काने,बहकाने की कोशिश की जाएगी ताकि हम लोग बहक जाएं और BJP तथा मनुवादी पार्टियों को Vote कर दें ।

हिन्दू मुस्लिम के चक्कर में न फसे :-

हमें हिंदू मुस्लिम के नाम पर भड़काया, बहकाया जाएगा ,इससे सावधान रहने की जरूरत है,  आप कभी हिंदू मुस्लिम के चक्कर में न रहे क्योंकि चुनाव आने पर आपको हिन्दू बना दिया जाता है ,और जब चुनाव खत्म होता है तो हमें चमार,भंगी ,बसोर,अहीर,गड़रिया नाई, धोबी,तेली ,तमोली,आदि आदि जातियों में बांट दिए जाते है ।
हमें हमेशा ध्यान रहे की मुसलमान हमारे कभी दुश्मन नहीं रहे, उन्होंने समय-समय पर हमारे महापुरुषों की मदद की है कभी भी किसी मुस्लिम ने हमारे Reservation का विरोध नहीं किया कभी भी किसी मुस्लिम ने हमारे ऊपर अन्याय अत्याचार नहीं किए , असल में मुसलमान इस देश का मूल निवासी है हमारा और मुसलमानों का खून एक ही है ।
 ये अन्याय अत्याचार BJP RSS के इशारे पर सवर्ण समाज के लोग करते हैं , मुस्लिम ने कभी भी हमारा शोषण नहीं किया , मुसलमान हमारे कभी दुश्मन नहीं रहे  हमें कभी भी हिंदू मुस्लिम या किसी प्रकार से जो हमें और मुसलमानों को अलग रखता है कभी भी SC ST तथा OBC को शामिल नहीं होना चाहिए ।

मनुवादी पार्टियों के बहकाबे न आये:-

इस बार किसी भी तरह BJP RSS तथा मनुवादी पार्टियों को सत्ता से बाहर करना होगा और बहुजन समाज के युवाओं को यह जिम्मा अपने ऊपर लेना होगा क्योंकि इस देश का नौजवान ही इस देश में परिवर्तन ला सकता है , हमें किसी भी हालत में BJP , Congress तथा Communist तथा और जो पार्टियां जिनकी Leadership सवर्णों के हाथ में है , तथा तमाम जो ब्राह्मणवादी Political Party हैं उनके बहकावे में नहीं आना है ।
  अगर हम कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जिसने मनुवाद ब्राह्मणवाद को इस देश में कायम कर रखा है,  मान्यवर कांशीराम साहब कांग्रेस को नागनाथ तथा बीजेपी को सांपनाथ कहा करते थे,ये एक A Team है दूसरी B Team है इसलिए बीजेपी कांग्रेस के खेल को हमें समझना चाहिये,और अगर हम कम्युनिस्ट पार्टियों की बात करें तो यह भी मनुवादी विचारधारा की पार्टियां हैं, कम्युनिस्ट धर्म को अफीम कहते हैं लेकिन इनके दिमाग में जनेऊ  छिपा रहता है , इनकी Leadership केवल सवर्णो के हाथ में है और ऐसी विचारधारा वाले लोग बहुजन समाज का कभी भला नहीं कर सकते ,हमें इनके इस खेल को भी अच्छी तरह से अपनी बुद्धि विवेक तथा तर्क से इनके इस System को समझना पड़ेगा ।
बहुजन समाज की पार्टियों को एक होना पड़ेगा :-
बहुजन पार्टिया
Bahujan Samaj Political Party

देश की बहुजन समाज की जितनी भी पार्टियां हैं उन्हें एक होना होगा देश में BJP को केंद्र तथा राज्य  से बाहर करने के लिए बहुजन समाज की जितनी भी पार्टियां हैं इनको एक होना पड़ेगा तथा तीसरा मोर्चा बनाकर इनको चुनावी मैदान में उतरना होगा ,अगर ऐसा करने में असफल हुए तो आने वाले समय में बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न होगी,  अगर 2019 के Election में BJP ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली तो बहुजन समाज का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा इसलिए अपने अस्तित्व को बचाने के लिए हमें एक होने की जरूरत है, हमें अपने आपस के मतभेदों से ऊपर उठकर बहुजन समाज के बारे में सोचना होगा ,तभी हम इस देश में अपनी सत्ता कायम कर सकते हैं तथा Bahujan Society तथा सर्व समाज का उद्धार हम कर सकते हैं ।
Read More:- मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?

Monday, 11 June 2018

मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?

         मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?

साथियों को जय भीम
उजाले की ओर का Part--5 लिख रहा हूं पिछला जो Part -5 था आप लोगों ने 1200 से ज्यादा बार और शेयर किया इसके लिए सभी साथियों को बहुत-बहुत धन्यवाद , आप उजाले की ओर का Part 5  है जिसका topic है मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?
आप सभी Reads से Request है कि यह लेख अच्छा लगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करके इस लेख को  पहुंचाए
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महात्मा बुद्ध
तथागत गौतम बुद्ध 

भगवान गौतम बुद्ध :-

बौद्ध धर्म के संस्थापक (Founder) भगवान गौतम बुद्ध थे, इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था ,गौतम बुद्ध को एशिया का ज्योति पुंज Light of Asia कहा जाता है । गौतम बुद्ध का जन्म 544 ईशा पूर्व में  कपिलवस्तु के लुंबिनी नामक स्थान पर हुआ था । इनके पिता शुद्धोधन शाक्य  गणराज्य के मुखिया थे । इनकी माता का नाम महामाया था । सिद्धार्थ के जन्म के 7वें दिन महामाया की मृत्यु (Death) हो गई थी ,उनका लालन-पालन उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया  जिनके साथ शुद्धोधन ने दूसरा विवाह कर लिया था ,गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की आयु में यशोधरा के साथ हुआ इनके पुत्र का नाम राहुल था । सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ में 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सन्यास धारण किया और 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात को पीपल के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गये और जिस स्थान पर ज्ञान प्राप्त हुआ था वह स्थान बोधगया कहलाया ।

तथागत गौतम बुद्ध का उपदेश :-

 भगवान गौतम बुद्ध ने उपदेश दिया है कि हमें किसी भी पवित्र बात को इसलिए नहीं माननी चाहिए कि वह वेदों में लिखी है, हमें कोई बात को इसलिए भी नहीं माननी चाहिए कि वह बात तुम्हें तुम्हारे गुरु ने बताई है, क्योंकि लोगों की गुरु  के प्रति श्रद्धा (Reverence) होती है , किसी बात को इसलिए भी नहीं माननी चाहिए कि वह बात पुराने समय से चली आ रही है, और लोग उसे सही मानते हैं भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों से यह भी कहा कि किसी भी बात को इसलिए नहीं माननी चाहिए कि  मैं कह रहा हूं , क्योंकि मेरे प्रति भी तुम्हारे मन में आदर और श्रद्धा (Reverence) है, किसी बात और विचार (Thought) को मानने से पहले उसे अपनी बुद्धि और विवेक से अच्छी तरह से जांच और परख लेनी चाहिए । जब लगे की कोई विचार सबके हित का है तब ही उस विचार को मानना चाहिए।
 भगवान गौतम बुद्ध ने लोगों को मध्य मार्ग की शिक्षा दी व्यक्ति को न तो अपने शरीर को बहुत ज्यादा यातना (Torture) देनी चाहिए और न ही उसे विलासिता पूर्ण (Full of luxury) जीवन में डूबना  चाहिए । यह मध्य मार्ग अष्टांगिक मार्ग कहलाता है, भगवान बुद्ध इस सिद्धांत को नहीं मानते थे ,कि किसी ईश्वर ने आदमी का निर्माण किया है अथवा वह ब्रह्मा के शरीर का अंश है भगवान बुद्ध वेदों द्वारा निर्मित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (Intricate system) को नहीं मानते थे।

भगवान बुद्ध ने बिना किसी भेदभाव की दी दीक्षा :-

 भगवान बुद्ध के उपदेशों का उस समय के जनमानस पर बहुत तेजी से Effect पड़ा, भगवान बुद्ध ने अपने धम्म में जहां एक तरफ उस समय के राजाओं शासकों को जगह दी दूसरी तरफ नाई भंगी चांडालों अछूतों और स्त्रियों को भी जगह दी ।
भगवान गौतम बुद्ध के धम्म से प्रभावित होकर मगध नरेश विम्बिसार गौतम बुद्ध की शरण में गये तथा बौद्ध धम्म के उपासक बन गए तथा कौशल नरेश प्रसन्नजीत भी भगवान बुद्ध से प्रभावित होकर बुद्ध धम्म के उपासक बन गये । उस समय के कई राज्यों के शासक बुद्ध धम्म से प्रभावित  होकर बौद्ध धम्म के उपासक बन गये । उस समय के कई राज्यों के शासकों ने बौद्ध धम्म ग्रहण किया । राजाओं और शासकों ने ही नहीं आम जनता (General public) को भी भगवान बुद्ध ने अपने धम्म में दीक्षित किया । भगवान तथागत गौतम बुद्ध स्त्रियों और पुरुषों में किसी भी प्रकार का भेद नहीं मानते थे । भगवान तथागत का मानना था कि पुरुषों की तरह स्त्रिया भी निर्वाण (Nirvana) प्राप्त कर सकती हैं । महाप्रजापति गौतमी पहली महिला थी , जिन्हें तथागत भगवान बुद्ध ने सबसे पहले धम्म में दीक्षा दी ।
  भगवान तथागत बुद्ध ने किसी भी जाति या वर्ग के साथ भेदभाव नहीं किया, नाई जाति के उपाली को तथागत ने भिक्षु संघ में दीक्षित किया इसके अलावा भंगी समाज के भंगी सुणीत को भी तथागत ने भिक्षु संघ में दीक्षित किया । सोपाक तथा सुपित्य नाम की अछूतों (Untouchables) को तथागत ने बिना किसी भेदभाव के भिक्षु बनाकर भिक्षु संघ में जगह दी ब्राह्मणों को भी भगवान बुद्ध ने बिना भेदभाव की भिक्षु संघ में दीक्षित किया ।

सम्राट अशोक ने World में फैलाया Unleashed बुद्ध का संदेश :-

सम्राट अशोक के शासनकाल में बुद्ध धम्म विदेशों में फैल गया, सम्राट अशोक ने अपने दूतों और धर्मप्रचारकों को सीरिया, मिश्र, मैसिडोनिया, साइरीन, आदि देशो में भेजा, जो तथागत बुद्ध के संदेश (Massage) और सम्राट की शुभकामनाओं को लेकर पहुंचे। सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र तथा बेटी संघमित्रा को मध्य एशिया तथा श्रीलंका में बुद्ध का संदेश लेकर भेजा और श्रीलंका वासियों ने बुद्ध धर्म को अपनाया । लगभग पूरे भारत में बौद्ध धम्म तेजी से फैल चुका था , इसका नतीजा यह हुआ कि लोग शाकाहारी बन गए शराब पीने से लोग बचने लगे यज्ञों में पशुओं का बलिदान रोक दिया गया । अक्सर ब्राह्मण लोग ही वैदिक धर्म (Vedic religion) का पालन करते थे, इसलिए वैदिक धर्म को ब्राह्मण धर्म कहा जाने लगा ।

ब्राह्मणों ने बुद्ध धम्म को बांटा :-

   लगभग पूरे देश की जनता बुद्ध धम्म को स्वीकार कर चुके थी यहां तक कि ब्राह्मण भी बौद्ध  धम्म के अनुयाई बन गये थे , कुछ ब्राह्मणों ने पूरे मन से बुद्ध धम्म अपनाया लेकिन कुछ ब्राह्मणों ने प्रथम सतावदी (First ever) में हुई चौथी बौद्ध संगति में महायान संप्रदाय बनाकर ,भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर भ्रामक कर बौद्ध धम्म को भारी नुकसान पहुँचाया । जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पेज क्रमांक 220 में लिखा है कि “ आदि शंकराचार्य ने भारत में व्यापक धर्म (Broad religion) के रूप में बुद्ध मत का अंत करने में मदद Help की, और इसके बाद ब्राह्मण धर्म ने बौद्ध मत को भाई की तरह गले लगा कर अपने में मिला लिया यही बुद्ध धम्म के पतन का मुख्य कारण है “

बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि बुद्ध का धम्म भारत में ही उत्पन्न (Generate) हुआ है, कई शताब्दियों तक बुद्ध धम्म भारत के लोगों का धर्म रह चुका है, बुद्ध धम्म संसार में एक ऐसा धर्म है, जो मनुष्य को बुद्धि की किसी धर्म ग्रंथ, मसीहा या धर्म गुरुओ के उपदेशों की खूंटी से नहीं बांधता बुद्ध धम्म मनुष्य को अपनी बुद्धि और विवेक (Intelligence and discretion) से सोचने समझने की स्वतंत्रता और शक्ति देता है । बुद्ध धम्म की सबसे बड़ी विशेषता उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, बुद्ध धम्म परलोकवाद , ईश्वरवाद और आत्मा की सत्यता में यकीन नहीं करता । संसार में फैले अनगिनत धर्मों में से बुद्ध धम्म अपनी अलग छवि रखता है और यह छवि बुद्ध के वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific approach) में हैं ।


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Thursday, 31 May 2018

हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?

सभी साथियों को जय भीम
उजाले की ओर का Part 4 लिख रहा हूं पिछले Part 3 जब आप पड़ेंगे तब आपको part 4 अच्छे से समझ आएगा उजाले की ओर के सभी Parts पड़ने के लिए इस पर Click करें  
आशा करता हूं Part 4 जिसका topic हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ? है आपको अगर अच्छा लगे तो Comment तथा Share करके दूसरे लोगों तक पहुचाएं
हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?
हिन्दू (ब्राह्मण धर्म) धर्म के प्रति विद्रोह आखिर क्यों ?

पूना समझौते के बाद बाबा साहब के गांधी और कांग्रेस से उठा विश्वास :-

पूना समझौते (Puna Pact) के बाद बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को थोड़ा विश्वास हो गया था कि, गांधी और कांग्रेस तथा हिंदू महासभा के प्रयासों से दलित वर्ग को हिंदू समाज में सम्मानजनक स्थान मिल जाएगा । लेकिन बाबा साहब का यह विश्वास जल्दी ही टूट गया, जब महात्मा गांधी ने दलितों को हरिजन नाम की गाली से संबोधित करना शुरू कर दिया । गांधी जी ने उसी वर्ष हरिजन सेवक संघ (Harijan Sevak Sangh) की स्थापना की थी, हरिजन सेवक संघ का अध्यक्ष गांधी ने उद्योगपति घनश्याम दास बिडला को बनाया था । गांधी जातिभेद और वर्ण व्यवस्था पर सदैव समर्थन करते रहें । वर्णाश्रम Varnashram को गांधी हिंदू धर्म का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग मानते थे । गांधी ने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में जाति प्रथा को श्रेष्ट बताया था । गांधी ने लिखा था कि, जाति प्रथा (Caste system) से समाज में स्थिरता कायम रहती है, गांधी व्यक्तियों द्वारा पैतृक व्यवसाय Ancestral occupation करने के सिद्धांतों को सही मानते थे  ।
 बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जल्द ही समझ गए कि पूना पैक्ट दलितों और सवर्णों के बीच व्याप्त दूरी को मिटाने का समझौता नहीं है । यह समझौता गांधी ने दलितों के राजनीतिक अधिकार छीनने (Snatch political rights) के लिए किया है । 3 वर्ष बीत जाने के बाद भी गांधी कांग्रेस और हिंदू महासभा ने दलितों के उत्थान के लिए ऐसे संतोषजनक प्रयास नहीं किए जिससे दलित वर्ग हिंदू वर्ग का अभिन्न अंग बन जाये ।

बाबा साहब दलित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक हर स्तर पर बराबरी और समानता का व्यवहार चाहते थे । उनको 1935 तक पूरा विश्वास हो गया था कि ब्राह्मण धर्म जिसे हिंदू महासभा और कांग्रेस कुछ वर्षों से नए नाम हिंदू धर्म के नाम से पुकारने लगी है । इस हिंदू धर्म में ब्राह्मण के सिवाय किसी भी वर्ग या जाति को कभी समानता नहीं मिल सकती क्योंकि हिंदू धर्म का सामाजिक उद्देश्य ही  असमानता Inequality है, हिंदू धर्म कई मंजिली इमारत जैसा है, जिसमें ना तो दरवाजे हैं ,और ना ही सीड़ियाँ। जो जिस मंजिल पर पैदा हुआ है उसे उसी मंजिल पर मरना है । यानि यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण जाति में पैदा हुआ है तो कितने भी खराब काम करने के बाद भी वह ब्राह्मण ही बना रहेगा, और सामाजिक स्तर (Social level) पर उस ब्राह्मणों का सम्मान भी मिलता है रहेगा । लेकिन यदि कोई व्यक्ति शूद्र अछूत समाज में पैदा हुआ है ,तो उसे  जीवन भर उसी जाति में रहना पड़ेगा, और जीवन भर जातिगत अपमान भी सहना पड़ेगा। बाबा साहब को पूरा विश्वास हो गया था कि जात पात तोड़क मंडल जैसी सामाजिक संस्थाओं Social institutions के प्रयास कभी सफल नहीं होंगे, क्योंकि हिंदू धर्म उस जहर के समान है, जिस जहर को अमृत बनाना संभव नहीं है ।

बाबा साहब ने की हिन्दू छोड़ने की घोषणा :-

  इसीलिए अंत में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने 13 अक्टूबर सन 1935 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि, मेरे अभागे भाइयों और बहनों जब मैं मुड़कर अपने आंदोलन के 10 सालो पर  नजर डालता हूं ,तो भविष्य के लिए चिंतित हो जाता हूं, बहुत हो चुका अब हम चुपचाप नहीं बैठेंगे समय आ गया है, जब हम इन दमन और तिरस्कार Disdain की जंजीरों को तोड़ दे, जात-पात के इस दलदल से बाहर निकल आइये, जिसने हमें बद से बदतर जिंदगी दी । सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकल आइये, और चुन लीजिए ऐसे धर्म को जो हमें बेहतर अवसर और समानता का अधिकार दे, दुर्भाग्य से मैं एक हिंदू अछूत के रूप में पैदा हुआ हूं, इसे रोकना मेरी शक्ति से बाहर था। लेकिन इन अपमान जनक Offensive परिस्थितियों में जीने से इनकार करना मेरी शक्ति में शामिल है। हालांकि मैं हिन्दू पैदा हुआ हूं लेकिन मैं भरोसा दिलाता हूं आपको कि एक हिंदू के रूप में हरगिज नहीं मरूँगा ।
 हिंदू धर्म त्यागने की ऐतिहासिक घोषणा के बाद बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संसार के सभी धर्मों का अध्ययन किया और 21 साल बाद बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया ।
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Monday, 28 May 2018

सन 1910 की जनगणना के आधार पर हिन्दू तथा गैर हिन्दू तथा पूना पैक्ट

सन 1910 की जनगणना के आधार पर हिन्दू  तथा गैर हिन्दू तथा पूना पैक्ट

1910 hindu gair hindu
1910 जनगणना के आधार पर हिन्दू गैर हिन्दू

सन 1910 में धर्म पर आधारित जनगणना में अंग्रेजों ने दलित, आदिवासी ,सिख ,जैन और बौद्ध समुदाय को हिंदू नहीं माना था बल्कि इन समुदायों को हिंदू धर्म से अलग समुदाय माना था
क्योंकि जनगणना Census आयुक्त ने केवल उन लोगों को हिंदू माना जिनके हिंदू होने पर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं था जनगणना के अनुसार:-
ब्राह्मण की श्रेष्ठता पर विश्वास करते हैं वे हिंदू है ।
  1. जो ब्राह्मणों (Brahman)या मान्य गुरुओं से गुरु मंत्र लेते हैं वह हिंदू है।
  2. जो वेदों का प्रमाणित ग्रन्थ Certified texts मानते हैं वे हिंदू हैं।
  3. ब्राह्मण Brahman जिनके यहां पुरोहिताई करते हैं वे  हिंदू हैं।
  4. जो हिन्दू देवी-देवताओं (Gods and Goddesses) की पूजा (worship) करते हैं वे हिंदू है।

1910 में जनगणना आयुक्त ने दलितों की हिंदुओं से अलग जनगणना की क्योंकि जनगणना आयुक्त ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें कारण स्पष्ट किया गया था:-
  1. जो ब्राह्मणों से गुरु मंत्र (गुरु दीक्षा Guru initiation) नहीं लेते उन्हें हिंदू नहीं माना।
  2. ब्राह्मण जिनके पारिवारिक Famiy पुरोहित नहीं है वे हिंदू नहीं है।
  3. जिनका कोई भी ब्राह्मण पुरोहित नहीं होता वे हिंदू नहीं है।
  4. जिन्हें हिंदू मंदिरों के अंदर जाने नहीं दिया जाता उन्हें जनगणना आयुक्त ने हिंदू नहीं माना।
  5. जो गाय का मांस खाते (Beaf) हैं और गाय की पूजा नहीं करते है वे हिंदू नहीं है।
वैसे तो बाबा साहब बचपन से ही दलित वर्ग की दुर्दशा पर चिंतित थे लेकिन जब वे पड़ लिख गए उन्हें भारतीय इतिहास और साहित्य का ज्ञान हो गया। तब उनके मन में इस दलित वर्ग का उत्थान करने की इच्छा हुई पढ़ाई  पूरी करने के बाद बाबा साहब दलितों की समस्यायें (Problems) सरकार के सामने रखने और दलितों की हर स्तर पर समानता दिलाने के लिए 20 जुलाई 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की। सन 1927 में साफ पानी पीने के अधिकार के लिए महाड सत्याग्रह किया। 25 दिसंबर 1927 को हिंदुओं के काले कानून मनुस्मृति को जलाया। सन1930 में बाबा साहब ने नाशिक कालाराम मंदिर में पूजा करने के लिए सत्याग्रह किया ।
बाबा साहब का कहना था कि यदि सवर्ण हिंदू दलितों को हिंदू मानते हैं तो हमें मंदिरों में पूजा करने का अधिकार भी मिलना चाहिए परिणाम स्वरुप 21 अप्रैल 1932 को कालाराम मंदिर के दरवाजे खुलवाने का सरकारी आदेश Government order हुआ फिर भी पंडित पुजारी दलितों के मंदिरों में पूजा करने का विरोध करते रहे।

पूना समझौता (Puna Pact)

पूना पैक्ट 1932- ambedkar- Ganghi
पूना समझौता 1932
भारतीय लंबे समय से  स्वराज्य की मांग कर रहे थे इसी मांग को पूरा करने के लिए अंग्रेज सरकार ने सन 1930-31 में लंदन में गोलमेज सम्मेलन Round Table Conference बुलाया डॉ भीमराव अंबेडकर दलित वर्ग की प्रतिनिधि Representative बनकर लंदन गए गोलमेज सम्मेलन में डॉ भीमराव अंबेडकर ने भाषण देते हुए कहा:-
दलित वर्ग यह 4 करोड़ 30 लाख लोगों का अथवा ब्रिटिश की भारत की जनसंख्या का पांचवा भाग है दलित वर्ग अपने में एक अलग वर्ग है वह मुसलमानों से स्पष्ट रुप से भिन्न और अलग है । यद्यपि दलित वर्ग Depressed classes के लोगों की गिनती हिंदुओं में की जाती हैं ,तो भी दलित वर्ग किसी भी तरह से हिंदू जाति का एक हिस्सा नहीं है । इतना ही नहीं दलित वर्ग का अलग अस्तित्व है”
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलन में भारतीयों के लिए स्वराज्य की मांग रखी तथा दलित वर्ग का हिंदू वर्ग से अलग अस्तित्व (separate entity) की मान्यता देते हुए अलग चुनाव क्षेत्रों की मांग रखी। गोलमेज परिषद ने दलित (अछूतो) के लिए विधान परिषद में अलग चुनाव क्षेत्रों की सिफारिश की थी।

दलितों के अलग चुनाव क्षेत्र (Separate constituencies) के विरोध में गांधी जी :-


 प्रथम गोलमेज सम्मेलन में गांधी और कांग्रेस ने भाग नहीं लिया लेकिन दूसरे सम्मेलन में गांधी ने भाग लिया और अपनी अमानवीय सोच का परिचय देते हुये दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र और राजनीतिक अधिकार देने का डटकर विरोध (Against) किया ।
गांधी जी का कहना था कि “ दलित वर्ग (अछूत वर्ग) हिंदू धर्म का एक ही हिस्सा है इसलिए अछूत वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग नहीं किया जा सकता इसलिए मैं दलित वर्ग और हिंदुओं में राजनीतिक रूप से बंटवारे के मैं खिलाफ हूँ” गांधी जी ने यह भी कहा कि” मैं प्राणों की बाजी लगाकर इस तरह के राजनीतिक बंटवारे का मैं विरोध करूंगा”
गांधीजी के कड़े विरोध के बावजूद ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैम्जै मैकडोनाल्ड ने डॉ भीमराव अंबेडकर के तर्क पक्ष और मांग को सही मानते हुये, 16 अगस्त 1932 को दलित वर्ग को हिंदुओं से अलग वर्ग मानते हुए, दलित वर्गों को राजनीतिक अधिकार देते हुये, उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्रों (Separate constituencies) का प्रावधान किया ।
दलित वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग वर्ग की मान्यता मिलने और  दलित वर्गों को राजनीतिक अधिकार मिलना गांधी जी को सहन नहीं हुआ और गांधी ने दलित वर्ग के लिए हिंदू वर्ग से अलग मान्यता मिलने और दलित वर्गों के लिए विधान मंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्र मिलने के विरोध में पूना के यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया ।

कांग्रेसियों ने पूना पैक्ट के विरोध में दलितों के साथ किए अत्याचार :-


गांधी की मांग थी कि दलित वर्गों को जो राजनीतिक अधिकार स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र मिले हैं उन्हें समाप्त कर दिया जाये। यरवदा जेल में गांधी के अनशन (Hunger-strike) के कारण पूरे देश में कांग्रेसियों ने अंबेडकर का विरोध करना शुरू कर दिया, दलितों के साथ मारपीट तथा हत्यायें, आगजनी करना शुरू कर दिया, दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिए गए। यह सब कांग्रेसी इसलिए कर रहे थे कि ताकि बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर दलितों को मिले राजनीतिक अधिकार  political rights को छोड़ देवे।

बाबा साहब अलग निर्वाचन क्षेत्र(Separate constituency) छोड़ने   को हुये मजबूर :-


कांग्रेसी बाबा साहब से गांधी से बात करने का अनुरोध भी कर रहे थे अंत में देश में शांति और दलितों की जान माल की रक्षा के लिए डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने पुणे की यरवदा जेल में जाकर गांधी से मुलाकात की लंबी बातचीत के बाद डॉ.अंबेडकर ने विधानमंडलों में मिले अलग निर्वाचन क्षेत्र के प्रस्ताव को छोड़ दिया और बदले में दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के मुआवजे के रूप में राजनीतिक आरक्षण स्वीकार कर लिया। समझौते के तहत दलित वर्ग को विधानमंडल में सुरक्षित क्षेत्र प्रदान किए गये यानि जो क्षेत्र दलितों के लिए सुरक्षित क्षेत्र (Safe zone) से गए उनमें केवल दलित वर्ग के प्रत्याशी खड़े हो सकेंगे लेकिन सभी वर्ग के मतदाता वोट डालेंगे ।
 24 सितंबर 1932 को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और गांधी के बीच एक समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट यह पूना समझौता के नाम से जाना जाता है इस समझौते पर दलित वर्ग(अछूत वर्ग) की तरफ से डॉ अंबेडकर ने तथा सवर्णों की तरफ से मदन मोहन मालवीय ने हस्ताक्षर Signature किए । इसके बाद गांधी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया ।

पूना पैक्ट समझौते के बाद बाबा के विचार :-


पूना समझौते को कांग्रेस ने सवर्ण हिंदुओं और दलितों के बीच व्याप्त दूरी को मिटाने का समझौता बताया था इस समझौते के समय गांधी ने डॉक्टर अंबेडकर को वचन दिया था कि मैं देश से छुआछूत को दूर करने का प्रयास करूंगा और दलित वर्ग और सवर्ण हिंदुओं के बीच व्याप्त कटुता और दूरी को दूर करने का प्रयास करूंगा ।
पूना समझौते होने के बाद 25 सितंबर सन 1932 को मुंबई में हुई अंतिम हिंदू कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर अंबेडकर ने चिंता व्यक्त की थी कि “ हमें चिंता है तो इस बात कि है कि क्या हिंदू जाति इस समझौते का पालन करेगी, हम अनुभव करते हैं कि दुर्भाग्य से हिंदू जाति की एक इकाई नहीं है” बाबा साहब ने यह भी कहा था कि “ चुनाव संबंधी कोई भी व्यवस्था बड़ी सामाजिक समस्या social problem का हल नहीं हो सकती, इसके लिए राजनीतिक समझौते मात्र पर्याप्त नहीं है मैं आशा करता हूं कि आपके लिए संभव होगा कि आप इसे राजनीतिक से आगे बढ़कर ऐसा कर सके जिसमें दलित वर्ग के लिए न केवल हिंदू समाज का एक हिस्सा बने रहना संभव हो जाए बल्कि उसे समाज में सम्मान और समानता का दर्जा (Level of equality)प्राप्त हो”