Sunday, 9 September 2018

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

Dr.ambedkar and ramabai
Dr.B.R. Ambedakar and Ramabai Ambedkar

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

कृपया पूरी पोस्ट पढ़े।
जब बड़ौदा के महाराज ने बाबा साहब को वजीफा दिया और बाबा साहब विदेश जा कर पढ़ना चाहते थे तब उनकी पत्नी रमाबाई और 5 बच्चे थे। तो देखिए किस प्रकार से बाबा साहब अपनी बात रमाबाई के सामने रखते हैं।

बाबा साहब - रमा बड़ौदा के महाराज ने मुझे वजीफा दिया है और मैं विदेश जा कर पढ़ना चाहता हूं लेकिन जब मैं तेरी तरफ मुड़कर देखता हूं तेरे पास 5 बच्चे हैं आमदनी का कोई साधन नहीं है और मैं भी तुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहा हूं क्या ऐसी परिस्थिति में तू मुझे विदेश जाकर पढ़ने की अनुमति देगी।

रमाबाई - बाबा साहब यह बात सच है कि मेरे पास 5 बच्चे हैं और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है और आप भी मुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहे हो लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाती हूं आप अपनी इच्छा को पूरी करके आना आप अपनी पढ़ाई को पूरी करके आना इन 5 बच्चों का पेट मैं खुद पाल लूंगी, और जब माता रमाबाई बाबा साहब को भरोसा दिलाती हैं तो बाबासाहब विदेश चले जाते हैं और अपनी पढ़ाई करते हैं और इधर माता रमाबाई अपने 5 बच्चों के पेट को पालने के लिए क्या करती है ।

माता रमाबाई मुंबई की गलियों से गोबर उठा कर लाती उसके बाद उपले बनाकर मुंबई की गलियों में उपले बेच कर आया करती और उससे जो पैसा आ जाता अपने बच्चों का पेट पालती है ।
इतना पैसा नहीं आता था कि वह अपने बच्चों की परवरिश कर पाती देखते ही देखते उनका बड़ा बेटा दामोदर बीमार हो गया। इलाज के पैसे नहीं थे इलाज के अभाव के कारण दामोदर इस दुनिया को छोड़ कर चला गया। यह बात माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई।

         (बाबा साहब द्वारा भेजा गया पत्र)

नानकचंद रत्तू खत पढ़ते हुए- बाबा साहब कहते हैं । कि रमा मैं यहां अगर एक वक्त का खाना खाता हूं तब भी मेरा काम नहीं चल पा रहा है मैं अपना जीवन बड़ी मुश्किल में व्यतीत कर रहा हूं में अपना सुबह का नाश्ता दोपहर में करता हूं और शाम को मैं पानी पीकर अपना काम चला रहा हूं और मैं जानता हूं कि तेरे सामने भी बहुत विफल परिस्थितियां हैं तेरे पास पांच बच्चे हैं  और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है फिर भी अगर हो सके तो कुछ पैसा भिजवा देना

इधर माता रमाबाई ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसा इकट्ठा किये थे। लेकिन उनकी बेटी इंदु बीमार हो जाती है अब माता रमाबाई के सामने एक बहुत बड़ा सवाल था कि वे उस पैसे से अपनी बेटी का इलाज कराएं या अपने पति को दिए गए वचन को निभाएं लेकिन एक मां ने फैसला किया और वह पैसा बाबा साहब को भेज दिया और इधर उनकी बेटी इंदू ने भी दम तोड़ दिया और यह बात भी माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई और बाबा साहब पढ़ते रहे और कुछ समय के बाद बाबा साहब अपनी पढ़ाई छोड़कर बड़ौदा के महाराज की रियासत में नौकरी करने के लिए आते हैं तो रमाबाई खुश होती है और क्या कहती है।

रमाबाई - अब तो मेरा पति डॉक्टर बन के आ रहा है अब मेरा पति नौकरी करेगा तनखा कमा कर लाएगा अब तो अपने बच्चों को मैं भरपेट खाना खिलाऊंगी अब तो मेरी जिंदगी के दिन बदल जाएंगे।

बाबा साहब जब दफ्तर में प्रवेश करते हैं।

चपरासी - टाट को खींच लेता है और पानी के घड़े को उठाकर अलग रख देता है ।

बाबा साहब - अरे चपरासी  जरा मुझे फाइल तो लाकर देना
चपरासी - फाइल को भी डंडे से उठा कर देता है।
बाबा साहब क्या बदतमीजी है यह क्या हो रहा है तू एक चपरासी होकर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है।

चपरासी - अंबेडकर तुम पढ़-लिख जरूर गए हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम हमारी बराबरी पर आ गए हो तुम आज भी नीच हो और तुम्हारे साथ में काम करके अपना धर्म नष्ट नहीं कर सकता

बाबा साहब - क्या मतलब मेरे साथ तेरा धर्म कैसे नष्ट हो सकता है और तू जानता है कि मैं तुझे नौकरी से निकाल सकता हूं ।

चपरासी - अंबेडकर यह बात में अच्छे से जानता हूं और तुम मुझे नौकरी से भले ही निकाल दो लेकिन मैं तुम्हारे साथ रहकर इस दफ्तर में काम नहीं कर सकता।

बाबा साहब मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर और अधिक नौकरी नहीं कर सकता।

संचालक - बाबा साहब ने 11वें ही दिन अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने घर के लिए निकलते हैं और बड़ौदा के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाते हैं वहां उनकी ट्रेन 4 घंटे लेट होती है तो बाबा साहब एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं और क्या कहते हैं।

बाबा साहब - मैं पहले यह सोचता था कि हमारे लोग मरे पशुओं को उठाते हैं उनकी खाल खींचते हैं और उनका मांस खाते हैं हमारे लोग दूसरों की टट्टी को अपने सर ऊपर उठाकर फेंकने का काम करते हैं मेरे लोग गंदे रहते हैं उनके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं है और उनके पास पैसा भी नहीं है तो हो सकता है यह लोग हमारे लोगों से इसलिए ऐसा व्यवहार करते हैं हो सकता है  यह लोग हमारे लोगों को इसीलिए नीच कहते है लेकिन आज तो मैंने यूरोप के कपड़े पहने हैं अमेरिका और जापान की यूनिवर्सिटियों से शिक्षा प्राप्त की है और एक अधिकारी बनकर मैं यहां आया हूं जब ये मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो जो मेरे समाज के अशिक्षित और अनपढ़ लोग हैं तो ये लोग उनके साथ कैसा व्यवहार करते होंगे (रोते हुए) अगर मैं अपने समाज को इस ग़ुरबत और गुलामी से आजाद नहीं करा पाया तो मैं वापस बड़ौदा लौट कर नहीं आऊंगा और मैं खुद को गोली मार लूंगा।

बाबा साहब जब नौकरी छोड़कर अपने घर पहुंचते हैं और यह बात रमाबाई को पता चलती है तो रमाबाई को बहुत दुख होता है।

बाबा साहब - रमा मैं नौकरी तो करना चाहता था लेकिन वहां का चपरासी मुझे फाइल डंडे में बांध कर देता पानी के घड़े को उठाकर अलग रख लेता और वहां के लोगों ने भी मुझे मारने की योजना बनाई मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर नौकरी नहीं कर सकता था इसीलिए मैं नौकरी छोड़ कर चला आया।

रमाबाई - बाबा साहब आपको जैसा अच्छा लगे आप वैसा ही काम करें मैं आपके साथ हूं।

फिर बाबा साहब को अपनी अधूरी पढ़ाई और बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर लिए गए संकल्प का ख्याल आता है तो बाबा साहब फिर से विदेश जाकर हम सब की गुलामी का कारण जो हिंदू धर्म के ग्रंथों में लिखा हुआ है उसे खोजते हैं इधर उनका तीसरा बेटा रमेश भी इस दुनिया को छोड़ कर चला जाता है इस प्रकार से बाबा साहब के तीन बच्चे कुर्बान हो जाते हैं। और जब बाबा साहब विदेश से लौट कर आते हैं और हमारी गुलामी व नीचता का कारण हमें बताते हैं।

बाबा साहब - मैं कड़ी मेहनत और लगन से यह जान पाया हूं। कि हमारे समाज के लोगों के साथ जो नीचता भरा और गुलामी का व्यवहार हो रहा है उसका कारण हिंदू धर्म के जो ग्रंथ हैं उनमें लिखा हुआ है और मैं आज यह घोषणा करता हूं कि 25 दिसंबर सन 1927 को पूरी देश की मीडिया को सूचना देकर इस हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सब को आजाद कर दूंगा।

संचालक - और बाबा साहब 25 दिसंबर सन 1927 को हजारों लाखों की संख्या के सामने हिंदू धर्म के ग्रंथों को वह मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सबको हम सबको इस नीचता और जिल्लत भरी जिंदगी से आजाद करते हैं और कहते हैं ।

25 दिसंबर 1927
बाबा साहब - मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मान सकता जो अमानवीय है और आज के बाद ऐसा कोई भी विधान  व कोई भी कानून मेरे समाज के लोगों पर लागू नहीं होगा जो अमानवीय है क्योंकि यह विधान जबरजस्ती हमारे समाज के लोगों पर थोपा गया हैं।

ऐसा कहकर बाबा साहब मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा देते हैं और आप सबको आजाद करा देते हैं उसके बाद बाबा साहब मुंबई की कोर्ट में वकालत करते हैं तो उनका जो चौथा बेटा होता है राजरतन वह बीमार हो जाता है देखिए वह दृश्य।

रमाबाई - नानकचंद रत्तू जाओ जल्दी से बाबा साहब को बुलाकर लाओ क्योंकि हमारा जो बेटा है राजरतन वह बहुत बीमार है और वह लंबी लंबी सांसे ले रहा है।

नानकचंद रत्तू - बाबा साहब बाबा साहब जल्दी से घर चलिए आपके पुत्र राजरतन की तबीयत बहुत खराब है और माता रमाबाई ने आपके लिए बुलावा भेजा है।

संचालक - जैसे ही बाबा साहब दौड़कर घर पहुंचते हैं और राजरतन को गोदी में लेते हैं तो राजरतन भी दम तोड़ देता है अपने चौथे बेटे की मौत पर पति के सामने माता रमाबाई क्या कहती हैं।

रमाबाई - रोते हुए बाबा साहब बस करो बाबा साहब अब तो बस करो क्योंकि आपके समाज सुधार की लालसा ने और ज्ञान पाने की लालसा ने मेरा पूरा घर उजाड़ के रख दिया है मैंने एक एक करके अपने 4 बच्चों को दफन कर दिया है बाबा साहब अब तो बस करो ।

बाबा साहब - रमा तू तो मुझे रो करके बता पा रही है मैं तो रो भी नहीं पा रहा हूं मैं तो रोज ऐसे सैकड़ों बच्चों को मरते हुए देखता हूं रमा तू चुप हो जा, रमा तू चुप हो जा।

रमाबाई - बाबा साहब मैंने आज तक आपकी हर बात को माना है और इस बात को भी मान लेती हूं और चुप हो जाती हूं लेकिन आप मुझे इतना बता दो कि आप बड़े फक्र से कहते थे कि तेरा बेटा राज रतन देश पर राज करेगा लेकिन अब यह इस दुनिया में नहीं रहा बताओ यह कैसे इस देश पर राज करेगा बाबा साहब मुझे बता दो कि यह कैसे देश पर राज करेगा।

बाबा साहब - रमा यह सच है कि तेरा यह पुत्र अब इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं और राजरतन के पार्थिव शरीर की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं अपने जीवन में ऐसा काम करके जाऊंगा कि हर रमा की कोख से पैदा हुआ राजरतन और हर मां की कोख से पैदा हुआ बेटा इस देश पर राज करेगा मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं।

इतना कहने के बाद बाबा साहब अपनी जेबों में हाथ डालते हैं और राजरतन के कफन के लिए उन की जेब में एक पैसा तक नहीं होता है इस बात को माता रमाबाई जानती है और रमाबाई अपनी साड़ी का दुपट्टा पार कर राजरतन के ऊपर डाल देती है और बाबा साहब को ख्याल आता आता है कि मुझे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना है और बाबा साहब राजरतन के पार्थिव शरीर को छोड़ घर पर ही छोड़ कर लंदन के लिए निकलते हैं तभी पीछे से उनका भाई दौड़कर आता है और कहता है।

भाई - भीम तू पागल हो गया है यह तेरा पुत्र मरा पड़ा है और तुझे विदेश जाने की सूझ रही है तू कैसा बाप है जो अपने पुत्र को इस अवस्था में छोड़कर विदेश जा रहा है और यह समाज क्या कहेगा अपने पुत्र को कंधा देकर उसका अंतिम क्रिया कर्म तो कर ले।

बाबा साहब - भाई मैं जानता हूं कि यह मेरा पुत्र मरा पड़ा है लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर आज मैं गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन नहीं गया तो गांधी एंड कंपनी के लोग मेरे करोड़ों करोड़ों लोगों को मार डालेंगे के सारे और हक अधिकारों को छीन लेंगे इसलिए मैं एक पुत्र की खातिर अपने करोड़ों करोड़ों लोगों को बलि चढ़ते हुए नहीं देख सकता यहां तुम सब लोग हो तुम सब संभाल लोगे ।

ऐसा कहते हुए बाबा साहब गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन चले जाते हैं और आज आपके जो बच्चे हैं आपका जो समाज है जो हक और अधिकार लेकर जी रहा है अपने बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े अच्छी अच्छी शिक्षा और नौकरियों में भेज रहा है इसका श्रेय केवल और केवल बाबा साहब को जाता है और आपके जो लोग हैं वह इस बात को अपने बच्चों को बताने तक शर्माते हैं।
(JAY BHIM JAY BHARAT)

Tuesday, 10 April 2018

सामाजिक क्रांति के महानायक महात्मा ज्योतिबा फुले

आज 11 अप्रैल के दिन सामाजिक क्रांति के महानायक महात्मा ज्योतिबा फुले Mahatma Phule जयंती के अवसर पर उनका जीवन परिचय मेरा स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण संक्षिप्त लिखने को मजबूर हुआ हूँ सभी साथियों से आशा करता हूँ सभी को अच्छा लगे इसमें आपके जो भी सुझाव हो comment Box में जरूर बतायें
Mahatma Phule
Mahatma Phule

प्रारंभिक जीवन :-

महात्मा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा पुणे महाराष्ट्र में हुआ था उनके पिता का नाम गोविंदराव फुले Govind rao  था 1 वर्ष की आयु में उनकी माता का निधन हो गया ज्योतिबा का पालन पोषण उनकी दाई सुगना बाई ने किया महात्मा फुले माली समाज के थे ।
7 वर्ष की उम्र में स्कूल की सीढ़ी चढ़ी लेकिन उस समय जातिवाद तथा शूद्र वर्ग के होने के कारण ब्राह्मणवादियों ने स्कूल से निकलवा दिया लेकिन गफ्फार वेग मुंशी Gaffar veg munshi था लिजित साहब की सहायता से उन्हें पुनः स्कूल जाने का मौका मिला ।
सन 1840 में महात्मा फुले की शादी सावित्रीबाई फुले के साथ हुई तथा महात्मा फुले के साथ सामाजिक आंदोलन में संघर्ष किया .

जातिवाद के कारण हुए अपमानित :-

एक बार ज्योतिबा फुले को उनके ब्राह्मण मित्र के निमंत्रण पर उनकी शादी में गए लेकिन एक शुद्र Shudra  को ब्राह्मण की बारात में शामिल होना ब्राह्मणों को अच्छा नहीं लगा तो महात्मा फुले जी को उस बरात में से अपमानित Humiliated करके बाहर निकाल दिया ,ज्योतिबा फुले को बारात में अपमानित होना उन्हें बहुत खराब लगा इस घटना ने उन्हें हिला का रख दिया और सोचने पर मजबूर हो गए , जब मुझ जैसे पढ़े लिखे सछूत शुद्र माली समाज की यह हालत है तो जिस देश में अछूत वर्ग ,महिलाएं है उनकी क्या हालत होगी तब उन्होंने इस जातिवादी प्रथा Racism को समाप्त करने का संकल्प लिया और उन्होंने इसका कारण अशिक्षा अज्ञानता बताया ।

शिक्षा(Education)के दरवाजे खोले :-

महात्मा फुले जी ने सन 1848 को सबसे पहली इस देश में लड़कियों और अछूतों के लिए पाठशाला School खोली तथा स्कूल में पढ़ाने के लिए उनकी पत्नी माता सावित्रीबाई फुले को पढ़ाने के लिए तैयार किया माता सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की सबसे पहली शिक्षिका Teacher बनी .
इससे पहले 5000 सालों में किसी ने स्कूल नहीं खोली न ही पढ़ने लिखने का मौका मिला क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार पढ़ने पढ़ाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को था .


घर से बाहर निकाला :-

महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले का अछूतों , शूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा Education देना पढ़ाना लिखाना ब्राह्मणों को पसंद नहीं आया उसने महात्मा फुले के पिता गोविंदराव को ब्राह्मणों ने भड़का दिया जिस कारण उनके पिता ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया तथा स्कूल उस जगह पर बंद करना पड़ा .
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और उनके मित्र उस्तान शेख नाम के मुसलमान ने अपने घर पे स्कूल चलाने के लिए जगह दी ।


सामाजिक सुधार Social Reform :-

महात्मा फुले ने शिक्षा सुधार के साथ-साथ सामाजिक सुधार में भी महत्वपूर्ण Important योगदान दिया ,किसानों की समस्या मुद्दों की बात को जोर-शोर से उठाया, उन्होंने  उस समय किसानों की समस्या के जो मुद्दे उठाए वो आज और भी ज्यादा तीव्र हो गए हैं जबकि वह ब्रिटिश British भारत था आज आधुनिक भारत है .
वे  प्रश्न करते हैं
“शारीरिक एक रचना में किसी भी तरह का अंतर न होने पर भी   दिन भर पसीना बहाने वाला सृष्टि का पालनहार किसान दुखी और भ्रष्ट नौकरशाह सुखी ऐसा क्यों “
उन्होंने सन 1864 में पहला विधवा विवाह कराया तथा बालहत्या प्रतिबंध, विधवा का मंडन प्रथा का महात्मा फुले तथा सावित्रीबाई फुले ने इसका विरोध किया, उन्होंने अपने घर का कुआं अछूतों के लिए खोल दिया तथा 1873 में पुरोहितों के बिना विवाह विधि आरंभ कर दी , तथा इसी दौरान 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की , तथा प्रचारित करने के लिए किताबें लिखना आरंभ कर दी
सन 1876 से 1882  समय में पुणे नगर पालिका के सदस्य वे चुने गये तथा इस शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 12 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा करने का प्रस्ताव रखा और उनका यह प्रयास था कि यह अनिवार्य हो ।
महात्मा फुले ने उस समय में 1873 में गुलामगिरी नामक प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी ।


महात्मा की उपाधि :-

महात्मा फुले जी ने अछूतों शूद्रों और महिलाओं
तथा निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए जीवन भर त्याग बलिदान तथा संघर्ष किया उनकी इस समाज सेवा को देखकर सन 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें महात्मा की उपाधि Degree दी गई ।

निधन :-

महात्मा फुले जी का निधन 28 नवंबर 1890 को उनका निधन हो गया वे एक ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने इस कारवां की शुरुआत की , संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने महात्मा फुले को अपना  गुरु Teacher मानते थे ।
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Monday, 19 March 2018

कांशीराम जी का अन्तिम उद्देश्य

Kanshiram sahab
कांशीराम जी का अन्तिम उद्देश्य 
साल1965 के समय जब कांशीराम जी बाबा साहब डॉ अंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर बाबा साहब के आंदोलन मूवमेंट को बढ़ाना चाह रहे थे ,तब उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) में साहब कांशीराम जी शामिल हुए लेकिन RPI के नेतागण बाबा साहब के Movement को छोड़ने की तैयारी कर चुके थे.

RPI के नेताओं का मानना था कि यह जो फुले शाहू आंबेडकर की विचारधारा ठीक है ,सही है मैं सहमत भी हूँ ,लेकिन इस विचारधारा से हम MLA नहीं बन सकते MP नहीं बन सकते तो कांशीराम जी सवाल पूछा करते थे कि क्या MLA MP बनना जरूरी है , तो उनके पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होता था .




इस प्रकार जिन लोगों की देख-रेख में डॉ.बाबा साहब अंबेडकर ने आंदोलन को चलाया आगे बढ़ाया संघर्ष किया वही लोग इस मूवमेंट को आंदोलन को छोड़ने की तैयारी कर चुके थे और बाबा करते-करते बापू के चरणों में आ गए.

ऐसा कांशीराम जी ने महाराष्ट्र के नेताओं और RPI का हाल देखा और उन्होंने निष्कर्ष निकाला।

" जिस समाज की गैर राजनीतिक जड़ें मजबूत नहीं होती हैं ,उस समाज की राजनीति कभी कामयाब नहीं होती है "

साहब कांशीराम जी गैर राजनीतिक जड़ें मजबूत करने के लिए 15 लाख कर्मचारियों का BAMCEF नाम का संगठन बनाया और फुले शाहू आंबेडकर की विचारधारा बहुजन समाज के कर्मचारियों को फुले शाहू अम्बेडकर की विचारधारा बताकर तैयार किया, मान्यवर कांशीराम जी का कहना था ,कि बाबा साहब के संघर्षों की वजह से आरक्षण मिला तथा उसी आरक्षण की वजह नौकरी पेशा करने का मौका मिला, तो बहुजन समाज के कर्मचारियों को समाज को कुछ वापिस भी करना पड़ेगा, इस तरह 6 दिसंबर 1978 को BAMCEF (The All India Backward And Minority Communities Employees Federation) की स्थापना की .



BAMCEF के माध्यम से संगठित होने के बाद संघर्ष करने के लिए सन 1981 मे DS4 ( दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) की स्थापना की .

उन्हीनें नारा दिया… … .

"ठाकुर बामन बनिया छोड़,बाकि सब है DS4"

DS4 के माध्यम से कांशीराम जी ने एक बड़ा आंदोलन Movement खड़ा करने की DS4 के माध्यम से खड़ा करने की कोशिश की .

इसके बाद 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की, तथा सामाजिक परिवर्तन आर्थिक मुक्ति राजनीति के माध्यम से संघर्ष आरंभ किया, और BSP बनने के 10 साल बाद 3 जून 1995 को बहुजन समाज पार्टी की पहली सरकार उत्तर प्रदेश में बनी जिसकी मुख्यमंत्री माननीय सुश्री बहन कुमारी मायावती जी बनी , और 1996 में बहुजन समाज पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा मिला, उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की 4 बार सरकार बनी , 4 ही बार बहन जी को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला ।

यह सब कांशीराम जी का 0 से राष्ट्रीय पार्टी बनाने का सफर था .

यह सफर आसान नहीं था इसके पीछे कांशीराम जी का बहुत बड़ा त्याग बलिदान रहा ,कांशीराम जी जब इस फुले शाहू अंबेडकर के आंदोलन को आगे की शुरुआत कर रहे थे तो ना तो उनके पास संगठन था ना पैसा था कांशीराम जी ने इस कारवां को आगे बढ़ाते समय उन्होंने 3-4 दिन की सूखी रोटी खाई, मुर्दों की उत्तरण पहनी तथा 5000 किलोमीटर साइकिल चलाकर 2000 किलोमीटर पैदल चलकर इस कारवां को आगे बढ़ाया .

कांशीराम जी अक्सर बोला करते थे… …

"सामाजिक क्रांति की चेतना दिल की गहराईयों से आती है, यह एक ऐसा तथ्य है,जो नौजवानों को इस बात के लिए प्रेरित करता है,कि वे सामाजिक आंदोलन में अपना योगदान दें "

अगर कांशीराम साहब नहीं होते तो शायद डॉ अंबेडकर नहीं जान पाते अगर इस भारत देश में सबसे बड़ा अंबेडकरवादी था तो वे कांशीराम थे, कांशीराम जी से बड़ा अंबेडकरवादी कभी पैदा नहीं हुआ .

कांशीराम साहब ने कहा था… ..

हमारा अंतिम लक्ष्य इस देश के बहुजन समाज को शासक बनना है।
यही मान्यवर कांशीराम साहब का अन्तिम उद्देश्य था .

Tuesday, 30 January 2018

बहुजन समाज के क्रांतिकारी संत रविदास जी

हमारे भारत देश में बहुजन समाज को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के लिए बहुत से संतो गुरुओं  महापुरुषों ने बहुजन समाज को हक अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया और अपना हर परिवार ना देख कर बहुजन समाज के लिए कुर्बानी दी 
जिनमें तथागत गौतम बुद्ध  Gautam Buddha ,संत कबीर Sant Kabir, संत रविदास ,महात्मा ज्योतिराव फूले Mahatma Phule , माता सावित्रीबाई फुले Mata Savitribai Phule, फातिमा शेख Fatima Sekh , छत्रपति शाहूजी महाराज  Chhatrapati Sahu ji Maharaj, बिरसा मुंडा Birsa Munda,डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर (Dr Babasaheb Ambedkar ) पेरियार रामासामी नायकर Periyar Ramasami Naukar , मान्यवर कांशीराम साहेब  Kamshiram Saheb जैसे अनेकों महापरुषों शामिल है.             
Sant Ravidas ji- Bahujan Sant
बहुजन समाज के महान क्रन्तिकारी संत रविदास जी
जिनमें से एक क्रांतिकारी संत रविदास जी भी हैं उनका जन्म 1398 को कासी बनारस में हुआ था उनके पिता का नाम रघु और माता का नाम कर्मा देवी था, इनके जन्म में वैचारिक मतभेद है
वे चमार जाति (Chamar Cast) के बताये जाते है ।
इनके पिता रघु जूते बनाने का काम करते थे , संत रविदास जी (Sant Ravidas ji) ने ब्राह्मणवाद जातिवाद के घोर विरोधी थे, उन्होंने ब्राह्मणवाद पर चोट करने के लिए दोहे छंद के माध्यम से ब्राह्मणवाद और जातिवाद पर करारी चोट की उस समय पर निम्न जाति के लोगों को पढ़ने पढ़ाने का अधिकार नहीं था और छुआछूत जातिवाद के शिकार लोग पीड़ित है ,उस समय पर अछूतों को न मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार था और न ही सार्वजनिक कुआं नदी तालाबों से पानी लेने का अधिकार नहीं था ।
शिक्षा लेने का और देने का अधिकार केवल ब्राह्मण वर्ग को ही था, और शासन करने का अधिकार क्षत्रिय को था और धन संपत्ति रखने का अधिकार केवल वैश्यों को था ,  अछूत और शूद्रों को केवल सेवा करने को कहा गया था ।
उस समय पर संत रविदास जी  (sant Ravidas ji) ने इस सामाजिक व्यवस्था का कड़ा विरोध किया बल्कि जाति व्यवस्था समाजवाद ब्राह्मणवाद पर कुठाराघात किया ।
संत रविदास जी ने अपनी रचनाओं में ब्राह्मणवाद का विरोध करना और तर्क करना उनकी रचनाओं में मिलता है
वे लिखते है
 जाति - जाति में जाति है,जो केतन के पात
 रैदास मानुष मानुष जुड़ सके जब तक जाति जात ।।

अर्थात :- जैसे पेड़ के तने के ऊपर पत्ते पत्ते ही होते हैं और पत्ते कभी खत्म नहीं होते हैं उसी प्रकार जाति- जाति में  बटा हुआ है ,जब तक जाति खत्म नहीं होती है तब तक इंसान इंसान से नहीं जुड़ सकता है ।

इस प्रकार संत रविदास जी जाति के बंधन को तोड़ने की बोल रहे हैं और उनके दोहे में स्पष्ट मिलता है ।
आगे लिखते है
ब्राह्मण मत पूछिए, जो होवे गुणहीन।
पूजिए चरण चंडाल के जो हो गए गुण प्रवीन ।।
    

अर्थात :-  संत रविदास लिखते हैं ,जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता है कर्म से होता है वे कहते हैं ब्राह्मण के चरण नहीं पूजना और ना ही आदर करना चाहिए जिनके कर्म या गुण खराब है
चंडाल के लोगों को आदर कीजिए जिनके गुण अच्छे हो मतलव् इसका सीधा अर्थ होता है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता है कर्म से होता है । इस प्रकार उन्होंने जातिवाद पर बहुत बड़ा प्रहार किया जिससे ब्राह्मण उस समय पर बौखला उठे ।
उस समय पर गरीबी लाचारी समाज में बहुत थी संत रविदास जी इस पर लिखते  है ।

  ऐसा चाहूं राज में मिले सबन को अन्न ।
  छोट बड़ो सम बसे रैदास रहे प्रसन्न ।।

अर्थात :- संत रविदास कहते हैं समाज में ऐसी शासन व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें कोई ना तो भूखा मरे और ना ही भूखा सोये ।
ऐसी शासन व्यवस्था संत रविदास जी चाहते थे ।

एक समय की बात है जब रविदास जी जूते बना रहे थे तब कुछ लोग बनारस में गंगा स्नान करने के लिए जा रहे थे तब ब्राह्मणवादियों ने उन लोगों को घाट पर जाने से रोक दिया और मना कर दिया तब रविदास जी ने कहा दोहो के माध्यम से लिखते है
 मन चंगा तो कठौती में गंगा

अर्थात :-  रविदास ने कहा कि जब इंसान का मन साफ है तो कहीं जाने की जरूरत नहीं है
इस तरह संत रविदास जी ने ब्राह्मणवाद के ऊपर जातिवाद के ऊपर चोट करी और ब्राह्मणवाद की जड़ों को  हिलाकर रख दिया ।

संत रविदास जी की  मृत्यु1540 को हो गई थी  संत रविदास जी ऐसे संत हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है ।

जय भीम     जय रविदास    जय भारत


Tuesday, 2 January 2018

माता सावित्री बाई फुले एक महान नायिका

Savitribai Phule
माता सावित्रीबाई फुले एक महान नायिका
 सभी साथियों को क्रांतिकारी जय भीम

प्रारंभिक जीवन :-

आज माता सावित्रीबाई फुले जयंती है,   वे एक नारी हैं, जिसने महिलाओं को शिक्षा दिलाने के लिए,हक दिलाने के लिए अधिकार दिलाने के लिए,अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ।

Sunday, 24 December 2017

बहुजन समाज ऋणी रहेगा फतेह खान नाम के मुसलमान का……

Manusmriti Dahan
मनुस्मृति दहन
जय भीम
25 दिसंबर 1927 को बाबा साहब ने हजारों लोगों के साथ मिलकर मनुस्मृति नामक काले कानून का सरेआम दहन किया , जिस मनुस्मृति ने बहुजन समाज के लोगों को 5000 सालों से गुलाम बना कर रखा था ।