Thursday, 23 August 2018

वैदिक धर्म और तथागत गौतम बुद्ध


               वैदिक धर्म और तथागत गौतम बुद्ध

Buddhism and Hindu Religion
वैदिक धर्म और तथागत गौतम बुद्ध
महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन उस समय कपिलवस्तु के राजा थे । उनकी माता का नाम महामाया था । राज्य परिवार में जन्म लेने के बाद भी भगवान बुद्ध का मन राजपाट और सुख सुविधाओं (Comfort facilities)में नहीं लगा, और उन्होंने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर दिया । तथा 6 वर्ष भटकने के बाद उन्हें बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान (Knowledge) प्राप्ति हुई । सारनाथ में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया, जिसे धम्म चक्र प्रवर्तक (Whirlwind change) कहा जाता है, भगवान बुद्ध वेदों की प्रमाणिकता में विश्वास नहीं करते थे, उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोण था ।

1.जहां ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) में वेदों को ईश्वर की रचना बताया जाता है, वही भगवान बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व Existence में विश्वास नहीं करते थे, वासेट्ठ और भारद्वाज ब्राह्मणों के प्रश्नों के उत्तर में भगवान बुद्ध Lord Buddha ने कहा था कि, जब किसी ने ब्रह्मा को देखा नहीं ? किसी ब्रह्मा Brahma का साक्षात्कार नहीं हुआ तब तुम कैसे मानते हो कि ब्रह्मा का अस्तित्व है ।

2. जहां ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) में कहा गया है, कि वेदों vedas के किसी भी शब्द पर प्रश्नचिन्ह (Question mark) नहीं लगाया जा सकता । वही कलाम  क्षत्रियों को संबोधित करते हुए तथागत गौतम बुद्ध (Lord Buddhaने कहा था कि कोई ऐसी चीज हो ही नहीं सकती जो गलत होने की संभावना से बिल्कुल न्यारी हो , वेद भी नहीं इसलिए भगवान बुद्ध ने कहा कि हर चीज का परीक्षण और संशोधन (Testing and modification) होते रहना चाहिए । तथागत ने कथन जारी रखा “ हे कलामों किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह तुम्हारे सुनने में आई है, किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह परंपरा से प्राप्त हुई है, किसी बात को केवल इसलिए (Hence) मत मानो कि बहुत से लोग उसके समर्थक हैं, किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह बात धर्म ग्रंथों में लिखी हैं, किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह किसी आदरणीय आचार्य Teacher कि कही हुई है “ किसी बात को मानने से पहले उसकी बुद्धि और विवेक से अच्छी तरह से जांच-परख कर लेनी चाहिए और जब लगे कि कोई विचार  idea सबके हित का है,तभी उसे मानना चाहिए ।

3. हिंदू धर्म( ब्राह्मण धर्म )में कहा गया है कि संसार की रचना God ने की है ,वही भगवान बुद्ध ने वासेट्ठ ब्राह्मण और भारद्वाज ब्राह्मणों से चर्चा करते हुए कहा था कि, यदि ईश्वर  ने सृष्टि (The creation) की रचना की है तो उसे किस पदार्थ से सृष्टि की रचना की है । यदि सृष्टि की रचना करने से पहले कोई पदार्थ चला आ रहा था, जिससे ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है तो, ईश्वर सृष्टि का पहला रचनाकार नही कहला सकता , ईश्वर अज्ञात है अदृश्य है कोई यह सिद्ध नहीं कर सकता कि, इस संसार world को ईश्वर ने बनाया है संसार का विकास हुआ है निर्माण नहीं हुआ ।

4. हिंदू धर्म Brahmanism के अनुसार ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, ब्राह्मण वर्ग सबसे ऊंचा है क्योंकि ब्राह्मण वर्ग ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ है, वही भगवान बुद्ध ने अश्वलायन ब्राह्मण के प्रश्न के उत्तर में कहा था, कि जब ब्राह्मणों की स्त्रियां दूसरे वर्गों की स्त्रियों की तरह ऋतु-मती होती है, गर्भधारण करती हैं, संतान का प्रसव करते हैं,तो कैसे कहा जा सकता है, कि Brahman ही श्रेष्ठ है ।

5. वेदों में वर्णों का समाज व्यवस्था को आदर्श समाज व्यवस्था (Ideal society system) कहा गया है, ब्राह्मण का काम पढ़ना-पढ़ाना और धार्मिक संस्कार करना, क्षत्रियों का काम राज्य करना और रक्षा करना, वैश्यों का काम व्यापार करना और शूद्रों का काम ऊपर के तीन वर्णों की सेवा करना , भगवान बुद्ध ने एसुकारी (Auscari) ब्राह्मण के प्रश्न का उत्तर में कहा था कि, यदि चातुर्वर्ण एक आदर्श समाज व्यवस्था है तो यवन और कमवोज पड़ोसी देशों (Neighboring countries)में यह वर्ण व्यवस्था लागू क्यों नहीं है । भगवान बुद्ध ने आगे कहा, जहां तक मेरी बात है आदमी को वही पेशा (Occupation)करना चाहिए, जिस व्यवसाय में उसकी स्थिति अच्छी हो, और उस व्यवसाय को छोड़ देना चाहिए,जिससे उसकी स्थिति खराब हो ।
6. ब्राह्मण धर्म के अनुसार शुद्रो तथा सभी वर्गों की महिलाओं को पढ़ने लिखने और उपनयन संस्कार का अधिकार Rights। नहीं है क्योंकि स्त्रियां अशुद्ध होती हैं, लेकिन भगवान बुद्ध ऐसा नहीं मानते थे , उन्होंने महा प्रजापति गौतमी, यशोधरा ,प्रकृति नामक चंडालिका आदि स्त्रियों को अपने धर्म में दीक्षित किया तथा पाली, नाई, भंगी सुनीत, अछूतों ,ब्राह्मणों तथा कई राजाओं को बिना भेदभाव (No discrimination)को अपने धम्म में दीक्षित किया ।
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7. हिंदू धर्म के अनुसार आत्मा की मुक्ति (Freedom of soul)या मोक्ष की प्राप्ति यज्ञ करने यज्ञ में पशुओं की बलि देने तथा दूसरी धार्मिक क्रियाएं करने तथा ब्राह्मणों को दान देने  से होती है , लेकिन भगवान बुद्ध यज्ञों में पशुओं की बलि देने के बिल्कुल खिलाफ थे ,उज्जय ब्राह्मण के प्रश्न के उत्तर में तथागत गौतम बुद्ध ने कहा था कि, हे! ब्राह्मण जिन यज्ञों Yagna में गाय की हत्या होती हो बकरियां और भेड़ों की बलि दी जाती हो, नाना तरह के प्राणियों की हत्या की जाती हो, मैं ऐसे यज्ञों की प्रशंसा नहीं करता ।

8. हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) के अनुसार व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार उच्च या नीच कुल में होता है, वही Mahatma Buddha किसी भी कुल को ऊंचा या नीचा नहीं मानते थे, जब भगवान बुद्ध के पास एक राज परिवार के लोग और साथ में उपाली नाई दीक्षा लेने आए तो तथागत बुद्ध ने पहले नाई उपाली को भिक्षु संघ में दीक्षित किया, फिर उसके बाद राजकुमारों को भिक्षु संघ में दीक्षा दी ताकि शाक्य कुल पुत्र उपाली नाई को अपने से बड़ा मानकर उस का अभिवादन कर सकें, क्योंकि भिक्खु संघ में जो पहले दीक्षित होता था, उसे बड़ा माना जाता था । और न ही भगवान बुद्ध आत्मा Spirit के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे, उन्होंने जैन भिक्षुओं से बातचीत करते हुए जोर देकर कहा था कि, वर्तमान जीवन का सुख-दुख परिस्थितियों का परिणाम है ।
   तथागत बुद्ध के धर्म से प्रभावित होकर देश के अधिकतर Mostly राजाओं ने वैदिक धर्म (हिंदू धर्म) छोड़ दिया और वे बौद्ध धर्म के उपासक बन गये , इनमे मगध के राजा अजातशत्रु, जिसका राज्य दक्षिण बिहार में स्थित था, वैशाली राज्य के लिच्छवि, कपिलवस्तु के शाक्य जिस कुल में Lord Buddha का जन्म हुआ, अहक्टय के बल्लि रामग्राम कोलि, पावा के मल्य, तथा कुशीनगर के मल्य आदि थे, इन राज्यों के शासकों ने बौद्ध धर्म अपनाया और वैदिक धर्म Vedic religion को त्याग दिया ।
   ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक (Emperor Ashok)  ने वैदिक धर्म का त्याग कर दिया और Buddhism में दीक्षित होकर बौद्ध धर्म के उपासक बन गये, सम्राट अशोक ने पूरे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बौद्ध धम्म का प्रचार (Publicity) किया, प्रथम शताब्दी में राजा कनिष्क और छठी शताब्दी में राजा हर्षवर्धन ने भी वैदिक धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म के उपासक Worshiper बन गए । वैदिक धर्म से लोगों का मोह भंग होना हमेशा जारी रहा और हमेशा से वैदिक धर्म में क्षरण (टूटन)होता रहा है ।

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Tuesday, 21 August 2018

Vedic religion and Buddha Dham

Vedic religion and Buddha Dham

Vedic religion and Buddha Dham
Mahatma Buddha was born in 563 BC in a Kshatriya family. His father's refinement was then the king of Kapilavastu. His mother's name was Mahamaya. Even after being born in a state family, Lord Buddha's mind did not feel in the palace and pleasures, and left home for a period of 29 years. After 6 years of wandering, he got knowledge under the people's tree in Bodh Gaya. Lord Buddha gave his first sermon in Sarnath, which is called the Dhamma Chakra initiator, Lord Buddha did not believe in the authenticity of the Vedas, his approach was a scientific approach.

1. Where in the Brahmin religion (Hinduism) the Vedas are said to be God's creation, Lord Buddha did not believe in the existence of God, in response to the questions of Vasattha and Bharadwaj Brahmins, Lord Buddha Lord Buddha had said that when Nobody saw Brahma? If no Brahma Brahma was interviewed then how do you believe that Brahma is the existence of Brahma?

2. Where Brahmin Dharma (Hinduism) has said, that no word of Vedas vedas can be questioned. While addressing the same Kalam Kshatriyas, Tathagata Gautam Lord Buddha had said that there can not be any such thing which is completely inadequate with the possibility of being wrong, not even the Vedas, therefore Lord Buddha said that everything will be tested and amended. Tathagata continued the statement, "O Kalam, do not think of any thing just because he has come to your hearing, do not think of anything just because he came from tradition. Just do not think of any thing (hence) that many people are his supporters, do not just think of any thing that it is written in the scriptures, do not think of any thing just because he is a respected teacher "Before accepting something, it should be thoroughly examined by his wisdom and discretion, and when it seems that a thought is of interest to everyone, then he should accept it.

3. Hinduism (Brahman Dharma) states that the creation of the world has been done, the same God Buddha had said in the discussion with the Wassetath Brahmins and Bharadwaj Brahmins, that if God has created the universe, then by what matter Creation has created the universe. If there was a substance coming before the creation of the universe, so that God has created the creation, then God can not be called the first creator of creation, God is unknown, invisible, nobody can prove that this world is God Has created the world has not been created.



4. According to Hindu religion Brahmin is the highest, Brahmin class is highest because Brahmin class has originated from the mouth of Brahma, Lord Buddha had said in response to Ashwaleen Brahmin's question that when the women of Brahmins were women of other classes As is the season of birth, conceive, give birth to children, how can it be said, that is the best.

5. In the Vedas, the social system of the character has been called ideal society system, reading and teaching of Brahmin's work, doing the duty of the Kshatriyas and protecting, doing business of Vaishyas and doing work of shudras for the above three characters To serve, Lord Buddha replied in the answer to the question of Asura Brahmin, that if Chatwarna is an ideal society system then Yavan and Kamovos will be in neighboring countries. This caste system do not apply. Lord Buddha said further, as far as I am concerned, one should do the same profession, the business in which his condition is good, and that business should be abandoned, due to which his condition is bad.

6. According to the Brahmin religion, according to the religion of Shudra and women of all sections, the right to write and worship is not the right because women are impure, but Lord Buddha did not consider such a thing; they gave birth to women like Mahat Prajapati Gautami, Yashodhara, Nature's Sundalika Dixit in his religion, and without any discrimination in Pali, Barber, Bhangi Suneet, Untouchables, Brahmins and many kings, Damage done.

7. According to Hindu religion, to sacrifice the sacrifice of liberation or salvation of the soul is sacrificed in sacrificial animals and performing other religious actions and donating to the Brahmins, but Lord Buddha was against the sacrifice of animals in sacrificial animals, Ujjay In response to Brahmin's question, Tathagata Gautam Buddha had said, Hey! The sacrifice of a cow in the sacrifice of a cow in which the cow is slaughtered, goats and sheep are sacrificed, many kinds of creatures are killed, I do not praise such sacrifices.
8. According to Hindu religion (Brahmin religion), the person is born in the higher or lower total according to the good deeds of his previous birth, he did not consider any of the total elevated or low, when a Buddha family had a Raj family When people came together to take the initiation of Upali Nai, Tathagata Buddha first conferred the Nai Upali in the monk's Sangha, then after that he initiated the princes in the monk's union so that Shakya total It is possible to greet the Upstairs Barley as bigger than him, because before that Bhikkhu Sangha was treated as bigger. Nor did Buddha believe in the reincarnation of the soul, while speaking with Jain monks, stressed that happiness and suffering of the present life is the result of circumstances.

Influenced by Tathagata Buddha's religion, most of the kings left the Vedic religion (Hinduism) and they became worshipers of Buddhism, among them King Ajatshatru of Magadha, whose kingdom was located in southern Bihar, Lichchavi of Vaishali state, Kapilavastu Shakya The total of which was born, the Ahakta ki Balli Ramgram Koli, the Pavah medal, and the Kushinagar prize were etc. The rulers of these states adopted Buddhism and Vedic Abandoned Rm.

In the third century BC, Emperor Ashoka abandoned Vedic religion and became a devotee of Buddhism, became a devotee, Emperor Asoka promoted Buddhism throughout India as well as abroad, King Kanishka and sixth in the first century In the century, King Harshavardhana also became a worshiper of Buddhism after leaving Vedic religion. The disintegration of people from Vedic religion has continued and there has been a continuous erosion (vandalism) in Vedic religion.
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Thursday, 12 July 2018

Dr.Amebedkar का बुद्धिज़्म से परिचय कब से और कैसे

Dr.Amebedkar का बुद्धिज़्म से परिचय कब से और कैसे

Buddhism and ambedkar
Dr.Amebedkar and Buddhism
डॉ भीमराव अंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने का एक मुख्य कारण यह भी था कि वे बचपन से ही बौद्ध धर्म से प्रभावित थे ,इसके बारे में बाबा साहब ने “बुद्ध और उनका धम्म “पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ,जिस वर्ष उन्होंने 4th Class परीक्षा उत्तीर्ण की थी तो उनकी जाति के लोगों ने उन्हें बधाई देने के लिए सार्वजनिक सभा Public meeting का आयोजन किया था, सभा के सभापति साहित्यकार और विद्वान दादा केलुस्कर थे सभा के अंत में दादा केलुस्कर ने बालक भीम को बुद्ध के जीवन पर अपनी स्वयं की लिखी पुस्तक भेंट की थी, बालक भीम ने वह पुस्तक बड़े ही चाव से पड़ डाली और पढ़कर अत्यंत प्रभावित influenced एवं द्रवित हुये, बालक भीम ने अपने पिताजी से पूछना शुरु कर दिया कि आप हम सबको बौद्ध साहित्य Buddhist literature से परिचित क्यों नहीं कराते आप हमें महाभारत और रामायण पढ़ने पर इतना जोर क्यों देते हैं ,जो ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की महानता और शूद्रों एवं अछूतों की नीचता को दर्शाने वाले वृतान्तों Annotations से भरे पड़े हैं, बालक भीम पिताजी द्वारा दी गई रामायण,महाभारत की पुस्तकों को पहले भी पढ़ चुके थे, फिर दादा केलुस्कर द्वारा दी गई भगवान बुद्ध की जीवनी (Biography of Lord Buddha) पढ़ने के बाद बुद्ध की ओर मुड़े ,तथा उस अल्प आयु में भी बालक भीम रामायण महाभारत के पात्रों तथा भगवान बुद्ध के चरित्र और ज्ञान की तुलना कर पाते थे, इसी तुलनायक अध्ययन Comparative Study के कारण बालक भीम के मन में Buddha के प्रति में रुचि उत्पन्न हुई तथा हिंदू (ब्राह्मण) धर्म के प्रति विद्रोह भड़का । हिंदू धर्म में व्याप्त वर्ण व्यवस्था और ऊंच-नीच की व्यवस्था, बाबा साहब को कभी रास नहीं आई, बाबा साहब का मानना था, कि जिस तरह भारत देश के लिए स्वराज्य जरूरी है वैसे ही दलित वर्ग के लिए धर्म परिवर्तन जरूरी है क्योंकि दोनों का उद्देश्य Objective आजादी की चाह है । ऐसे अनगिनत कारणों और विशेषताओं के कारण बाबा साहब ने महाराष्ट्र के नागपुर शहर में 14 अक्टूबर सन 1956 को अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी यह एक अद्भुत संयोग है कि मैं यह लाइनें आज 14 अक्टूबर सन 2016 को लिख रहा हूं बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने उपस्थित जनसमूह Crowd को 22 प्रतिज्ञा दिलावायी थी वे प्रतिज्ञाएं है :-
22 प्रतिज्ञाएँ
डॉ.  अम्बेडकर द्वारा दिलायी गई 22 प्रतिज्ञाएँ
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में विशाल जनसमूह के सामने एक महान भाषण में जनता से बौद्ध धम्म में दीक्षित होने का आवाहन किया तथा दलित वर्ग को गंदे कामों को छोड़ने का आह्वान किया तथा खासतौर से महारों को मृत पशुओं का सड़ा गला मांस (Rotten Meat) न खाने की सलाह दी |
15 अक्टूबर सन 1956 को दीक्षाभूमि बाबा साहब ने नव दीक्षित बौद्धों को संबोधित करते हुए कहा कि "आप लोग ऐसे काम करने चाहिए जिन कामों से आप लोगों का अन्य लोगों के मन में आपका आदर बड़े, यह धम्म अपनाकर गले में बोझ लटका लिया है, ऐसा मत समझिए बौद्ध धम्म की दृष्टि से भारत अब शून्यवत है ,इसलिए हमें अच्छी तरह से धम्म का पालन करने का संकल्प Oath लेना चाहिए, यदि हमने यह कर लिया तो हमारे साथ-साथ देश का उद्धार करोगे ,बाबा साहब ने यही कहा था तथागत बुद्ध ने उस समय की परिस्थितियों के अनुसार अपने धम्म को प्रचार का मार्ग तैयार किया था, अब हमें भी योजना बनानी चाहिए इसीलिए हर किसी को हर एक व्यक्ति को दीक्षा देनी चाहिए हर एक बौद्ध व्यक्ति को दीक्षा देने का अधिकार है मैं ऐसा ऐलान Announcement करता हूँ "

Monday, 11 June 2018

मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?

         मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?

साथियों को जय भीम
उजाले की ओर का Part--5 लिख रहा हूं पिछला जो Part -5 था आप लोगों ने 1200 से ज्यादा बार और शेयर किया इसके लिए सभी साथियों को बहुत-बहुत धन्यवाद , आप उजाले की ओर का Part 5  है जिसका topic है मानवता के लिए आखिर बुद्ध धम्म ही क्यों ?
आप सभी Reads से Request है कि यह लेख अच्छा लगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करके इस लेख को  पहुंचाए
उजाले की ओर के सभी Parts पड़ने के लिए यहाँ Click करे ….

महात्मा बुद्ध
तथागत गौतम बुद्ध 

भगवान गौतम बुद्ध :-

बौद्ध धर्म के संस्थापक (Founder) भगवान गौतम बुद्ध थे, इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था ,गौतम बुद्ध को एशिया का ज्योति पुंज Light of Asia कहा जाता है । गौतम बुद्ध का जन्म 544 ईशा पूर्व में  कपिलवस्तु के लुंबिनी नामक स्थान पर हुआ था । इनके पिता शुद्धोधन शाक्य  गणराज्य के मुखिया थे । इनकी माता का नाम महामाया था । सिद्धार्थ के जन्म के 7वें दिन महामाया की मृत्यु (Death) हो गई थी ,उनका लालन-पालन उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया  जिनके साथ शुद्धोधन ने दूसरा विवाह कर लिया था ,गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की आयु में यशोधरा के साथ हुआ इनके पुत्र का नाम राहुल था । सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ में 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सन्यास धारण किया और 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात को पीपल के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गये और जिस स्थान पर ज्ञान प्राप्त हुआ था वह स्थान बोधगया कहलाया ।

तथागत गौतम बुद्ध का उपदेश :-

 भगवान गौतम बुद्ध ने उपदेश दिया है कि हमें किसी भी पवित्र बात को इसलिए नहीं माननी चाहिए कि वह वेदों में लिखी है, हमें कोई बात को इसलिए भी नहीं माननी चाहिए कि वह बात तुम्हें तुम्हारे गुरु ने बताई है, क्योंकि लोगों की गुरु  के प्रति श्रद्धा (Reverence) होती है , किसी बात को इसलिए भी नहीं माननी चाहिए कि वह बात पुराने समय से चली आ रही है, और लोग उसे सही मानते हैं भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों से यह भी कहा कि किसी भी बात को इसलिए नहीं माननी चाहिए कि  मैं कह रहा हूं , क्योंकि मेरे प्रति भी तुम्हारे मन में आदर और श्रद्धा (Reverence) है, किसी बात और विचार (Thought) को मानने से पहले उसे अपनी बुद्धि और विवेक से अच्छी तरह से जांच और परख लेनी चाहिए । जब लगे की कोई विचार सबके हित का है तब ही उस विचार को मानना चाहिए।
 भगवान गौतम बुद्ध ने लोगों को मध्य मार्ग की शिक्षा दी व्यक्ति को न तो अपने शरीर को बहुत ज्यादा यातना (Torture) देनी चाहिए और न ही उसे विलासिता पूर्ण (Full of luxury) जीवन में डूबना  चाहिए । यह मध्य मार्ग अष्टांगिक मार्ग कहलाता है, भगवान बुद्ध इस सिद्धांत को नहीं मानते थे ,कि किसी ईश्वर ने आदमी का निर्माण किया है अथवा वह ब्रह्मा के शरीर का अंश है भगवान बुद्ध वेदों द्वारा निर्मित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (Intricate system) को नहीं मानते थे।

भगवान बुद्ध ने बिना किसी भेदभाव की दी दीक्षा :-

 भगवान बुद्ध के उपदेशों का उस समय के जनमानस पर बहुत तेजी से Effect पड़ा, भगवान बुद्ध ने अपने धम्म में जहां एक तरफ उस समय के राजाओं शासकों को जगह दी दूसरी तरफ नाई भंगी चांडालों अछूतों और स्त्रियों को भी जगह दी ।
भगवान गौतम बुद्ध के धम्म से प्रभावित होकर मगध नरेश विम्बिसार गौतम बुद्ध की शरण में गये तथा बौद्ध धम्म के उपासक बन गए तथा कौशल नरेश प्रसन्नजीत भी भगवान बुद्ध से प्रभावित होकर बुद्ध धम्म के उपासक बन गये । उस समय के कई राज्यों के शासक बुद्ध धम्म से प्रभावित  होकर बौद्ध धम्म के उपासक बन गये । उस समय के कई राज्यों के शासकों ने बौद्ध धम्म ग्रहण किया । राजाओं और शासकों ने ही नहीं आम जनता (General public) को भी भगवान बुद्ध ने अपने धम्म में दीक्षित किया । भगवान तथागत गौतम बुद्ध स्त्रियों और पुरुषों में किसी भी प्रकार का भेद नहीं मानते थे । भगवान तथागत का मानना था कि पुरुषों की तरह स्त्रिया भी निर्वाण (Nirvana) प्राप्त कर सकती हैं । महाप्रजापति गौतमी पहली महिला थी , जिन्हें तथागत भगवान बुद्ध ने सबसे पहले धम्म में दीक्षा दी ।
  भगवान तथागत बुद्ध ने किसी भी जाति या वर्ग के साथ भेदभाव नहीं किया, नाई जाति के उपाली को तथागत ने भिक्षु संघ में दीक्षित किया इसके अलावा भंगी समाज के भंगी सुणीत को भी तथागत ने भिक्षु संघ में दीक्षित किया । सोपाक तथा सुपित्य नाम की अछूतों (Untouchables) को तथागत ने बिना किसी भेदभाव के भिक्षु बनाकर भिक्षु संघ में जगह दी ब्राह्मणों को भी भगवान बुद्ध ने बिना भेदभाव की भिक्षु संघ में दीक्षित किया ।

सम्राट अशोक ने World में फैलाया Unleashed बुद्ध का संदेश :-

सम्राट अशोक के शासनकाल में बुद्ध धम्म विदेशों में फैल गया, सम्राट अशोक ने अपने दूतों और धर्मप्रचारकों को सीरिया, मिश्र, मैसिडोनिया, साइरीन, आदि देशो में भेजा, जो तथागत बुद्ध के संदेश (Massage) और सम्राट की शुभकामनाओं को लेकर पहुंचे। सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र तथा बेटी संघमित्रा को मध्य एशिया तथा श्रीलंका में बुद्ध का संदेश लेकर भेजा और श्रीलंका वासियों ने बुद्ध धर्म को अपनाया । लगभग पूरे भारत में बौद्ध धम्म तेजी से फैल चुका था , इसका नतीजा यह हुआ कि लोग शाकाहारी बन गए शराब पीने से लोग बचने लगे यज्ञों में पशुओं का बलिदान रोक दिया गया । अक्सर ब्राह्मण लोग ही वैदिक धर्म (Vedic religion) का पालन करते थे, इसलिए वैदिक धर्म को ब्राह्मण धर्म कहा जाने लगा ।

ब्राह्मणों ने बुद्ध धम्म को बांटा :-

   लगभग पूरे देश की जनता बुद्ध धम्म को स्वीकार कर चुके थी यहां तक कि ब्राह्मण भी बौद्ध  धम्म के अनुयाई बन गये थे , कुछ ब्राह्मणों ने पूरे मन से बुद्ध धम्म अपनाया लेकिन कुछ ब्राह्मणों ने प्रथम सतावदी (First ever) में हुई चौथी बौद्ध संगति में महायान संप्रदाय बनाकर ,भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर भ्रामक कर बौद्ध धम्म को भारी नुकसान पहुँचाया । जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पेज क्रमांक 220 में लिखा है कि “ आदि शंकराचार्य ने भारत में व्यापक धर्म (Broad religion) के रूप में बुद्ध मत का अंत करने में मदद Help की, और इसके बाद ब्राह्मण धर्म ने बौद्ध मत को भाई की तरह गले लगा कर अपने में मिला लिया यही बुद्ध धम्म के पतन का मुख्य कारण है “

बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि बुद्ध का धम्म भारत में ही उत्पन्न (Generate) हुआ है, कई शताब्दियों तक बुद्ध धम्म भारत के लोगों का धर्म रह चुका है, बुद्ध धम्म संसार में एक ऐसा धर्म है, जो मनुष्य को बुद्धि की किसी धर्म ग्रंथ, मसीहा या धर्म गुरुओ के उपदेशों की खूंटी से नहीं बांधता बुद्ध धम्म मनुष्य को अपनी बुद्धि और विवेक (Intelligence and discretion) से सोचने समझने की स्वतंत्रता और शक्ति देता है । बुद्ध धम्म की सबसे बड़ी विशेषता उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, बुद्ध धम्म परलोकवाद , ईश्वरवाद और आत्मा की सत्यता में यकीन नहीं करता । संसार में फैले अनगिनत धर्मों में से बुद्ध धम्म अपनी अलग छवि रखता है और यह छवि बुद्ध के वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific approach) में हैं ।


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